शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

नदियों का निरादर : ज्ञानेंद्र रावत


इसे अपनी संस्कृति की विशेषता कहें या परंपरा, हमारे यहां मेले नदियों के तट पर, उनके संगम पर या धर्म स्थानों पर लगते हैं और जहां तक कुंभ का सवाल है, वह तो नदियों के तट पर ही लगते हैं। आस्था के वशीभूत लाखों-करोड़ों लोग आकर उन नदियों में स्नान कर पुण्य अर्जित कर खुद को धन्य समझते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि वे उस नदी के जीवन के बारे में कभी भी नहीं सोचते। देश की नदियों के बारे में केंद्रीय प्रदूषण नियत्रंण बोर्ड ने जो पिछले दिनों खुलासा किया है, वह उन संस्कारवान, आस्थावान और संस्कृति के प्रतिनिधि उन भारतीयों के लिए शर्म की बात है, जो नदियों को मां मानते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपने अध्ययन में कहा है कि देशभर के 900 से अधिक शहरों और कस्बों का 70 फीसदी गंदा पानी पेयजल की प्रमुख स्रोत नदियों में बिना शोधन के ही छोड़ दिया जाता है।

वर्ष 2008 तक के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, ये शहर और कस्बे 38,254 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) गंदा पानी छोड़ते हैं, जबकि ऎसे पानी के शोधन की क्षमता महज 11,787 एमएलडी ही है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कथन बिलकुल सही है। नदियों को प्रदूषित करने में दिनों दिन बढ़ते उद्योगों ने भी प्रमुख भूमिका निभाई है। इसमें दो राय नहीं है कि देश के सामने आज नदियों के अस्तित्व का संकट मुंह बाए खड़ा है। कारण आज देश की 70 फीसदी नदियां प्रदूषित हैं और मरने के कगार पर हैं। इनमें गुजरात की अमलाखेड़ी, साबरमती और खारी, हरियाणा की मारकंडा, उत्तर प्रदेश की काली और हिंडन, आंध्र की मुंसी, दिल्ली में यमुना और महाराष्ट्र की भीमा नदियां सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। यह उस देश में हो रहा है, जहां आदिकाल से नदियां मानव के लिए जीवनदायिनी रही हैं। 

उनकी देवी की तरह पूजा की जाती है और उन्हें यथासंभव शुद्ध रखने की मान्यता व परंपरा है। समाज में इनके प्रति सदैव सम्मान का भाव रहा है। एक संस्कारवान भारतीय के मन-मानस में नदी मां के समान है। उस स्थिति में मां से स्नेह पाने की आशा और देना संतान का परम कर्तव्य हो जाता है। फिर नदी मात्र एक जलस्त्रोत नहीं, वह तो आस्था की केंद्र भी है। विश्व की महान संस्कृतियों-सभ्यताओं का जन्म भी न केवल नदियों के किनारे हुआ, बल्कि वे वहां पनपी भी हैं। 

वेदकाल के हमारे ऋषियों ने पर्यावरण संतुलन के सूत्रों के दृष्टिगत नदियों, पहाड़ों, जंगलों व पशु-पक्षियों सहित पूरे संसार की और देखने की सहअस्तित्व की विशिष्ट अवधारणा को विकसित किया है। उन्होंने पाषाण में भी जीवन देखने का जो मंत्र दिया, उसके कारण देश में प्रकृति को समझने व उससे व्यवहार करने की परंपराएं जन्मीं। यह भी सच है कि कुछेक दशक पहले तक उनका पालन भी हुआ, लेकिन पिछले 40-50 बरसों में अनियंत्रित विकास और औद्योगीकरण के कारण प्रकृति के तरल स्नेह को संसाधन के रूप में देखा जाने लगा, श्रद्धा-भावना का लोप हुआ और उपभोग की वृत्ति बढ़ती चली गई। चूंकि नदी से जंगल, पहाड़, किनारे, वन्य जीव, पक्षी और जन जीवन गहरे तक जुड़े हैं, इसलिए जब नदी पर संकट आया, तब उससे जुड़े सभी सजीव-निर्जीव प्रभावित हुए बिना न रहे और उनके अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा। असल में जैसे-जैसे सभ्यता का विस्तार हुआ, प्रदूषण ने नदियों के अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया। 

लिहाजा, कहीं नदियां गर्मी का मौसम आते-आते दम तोड़ देती हैं, कहीं सूख जाती हैं, कहीं वह नाले का रूप धारण कर लेती हैं और यदि कहीं उनमें जल रहता भी है तो वह इतनी प्रदूषित हैं कि वह पीने लायक भी नहीं रहता है। देखा जाए तो प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने में भी हमने कोताही नहीं बरती। वह चाहे नदी जल हो या भूजल, जंगल हो या पहाड़, सभी का दोहन करने में कीर्तिमान बनाया है। हमने दोहन तो भरपूर किया, उनसे लिया तो बेहिसाब, लेकिन यह भूल गए कि कुछ वापस देने का दायित्व हमारा भी है। नदियों से लेते समय यह भूल गए कि यदि जिस दिन इन्होंने देना बंद कर दिया, उस दिन क्या होगा? आज देश की सभी नदियां वह चाहे गंगा, यमुना, नर्मदा, ताप्ती हो, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी हो, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, रावी, व्यास, झेलम या चिनाब हो या फिर कोई अन्य या इनकी सहायक नदियां। ये हैं तो पुण्य सलिला, लेकिन इनमें से एक भी ऎसी नहीं है, जो प्रदूषित न हो। 

असल में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का खामियाजा सबसे ज्यादा नदियों को ही भुगतना पड़ा है। सर्वाधिक पूज्य धार्मिक नदियों गंगा-यमुना को लें, उनको हमने इस सीमा तक प्रदूषित कर डाला है कि दोनों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अब तक करीब 15 अरब रूपये खर्च किए जा चुके हैं, फिर भी उनकी हालत 20 साल पहले से ज्यादा बदतर है। मोक्षदायिनी राष्ट्रीय नदी गंगा को मानवीय स्वार्थ ने इतना प्रदूषित कर डाला है कि कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी और पटना सहित कई एक जगहों पर गंगाजल आचमन लायक भी नहीं रहा है। यदि धार्मिक भावना के वशीभूत उसमें डुबकी लगा ली तो त्वचा रोग के शिकार हुए बिना नहीं रहेंगे। कानपुर से आगे का जल पित्ताशय के कैंसर और आंत्रशोध जैसी भयंकर बीमारियों का सबब बन गया है। यही नहीं, कभी खराब न होने वाला गंगाजल का खास लक्षण-गुण भी अब खत्म होता जा रहा है। गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के प्रो. बी.डी. जोशी के निर्देशन में हुए शोध से यह प्रमाणित हो गया है। 

दिल्ली के 56 फीसदी लोगों की जीवनदायिनी, उनकी प्यास बुझाने वाली यमुना आज खुद अपने ही जीवन के लिए जूझ रही है। जिन्हें वह जीवन दे रही है, अपनी गंदगी, मलमूत्र, उद्योगों का कचरा, तमाम जहरीला रसायन व धार्मिक अनुष्ठान के कचरे का तोहफा देकर वही उसका जीवन लेने पर तुले हैं। असल में अपने 1376 किमी लंबे रास्ते में मिलने वाली कुल गंदगी का अकेले दो फीसदी यानी 22 किमी के रास्ते में मिलने वाली 79 फीसदी दिल्ली की गंदगी ही यमुना को जहरीला बनाने के लिए काफी है। यमुना की सफाई को लेकर भी कई परियोजनाएं बन चुकी हैं और यमुना को टेम्स बनाने का नारा भी लगाया जा रहा है, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात रहे हैं। देश की प्रदूषित हो चुकी नदियों को साफ करने का अभियान पिछले लगभग 20 साल से चल रहा है। 

इसकी शुरूआत राजीव गांधी की पहल पर गंगा सफाई अभियान से हुई थी। अरबों रूपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन असलियत है कि अब भी शहरों और कस्बों का 70 फीसदी गंदा पानी बिना शोधित किए हुए ही इन नदियों में गिराया जा रहा है। नर्मदा को लें, अमरकंटक से शुरू होकर विंध्य और सतपुड़ा की पहाडियों से गुजरकर अरब सागर में मिलने तक कुल 1,289 किलोमीटर की यात्रा में इसका अथाह दोहन हुआ है। 1980 के बाद शुरू हुई इसकी बदहाली के गंभीर परिणाम सामने आए। यही दुर्दशा बैतूल जिले के मुलताई से निकलकर सूरत तक जाने वाली और आखिर में अरब सागर में मिलने वाली सूर्य पुत्री ताप्ती की हुई, जो आज दम तोड़ने के कगार पर है। तमसा नदी बहुत पहले विलुप्त हो गई थी। बेतवा की कई सहायक नदियों की छोटी-बड़ी जल धाराएं भी सूख गई हैं। 

आज नदियां मलमूत्र विसर्जन का माध्यम बनकर रह गई हैं। ग्लोबल वार्मिग का खतरा बढ़ रहा है और नदी क्षेत्र पर अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है और जल संकट और गहराएगा ही। ऎसी स्थिति में हमारे नीति-नियंता नदियों के पुनर्जीवन की उचित रणनीति क्यों नहीं बना सके, जल के बड़े पैमाने पर दोहन के बावजूद उसके रिचार्ज की व्यवस्था क्यों नहीं कर सके, वर्षा के पानी को बेकार बह जाने देने से क्यों नहीं रोक पाए और अतिवृष्टि के बावजूद जल संकट क्यों बना रहता है, यह समझ से परे है। वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल संकट दूर करने के शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए गए तो बहुत देर हो जाएगी और मानव अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

रविवार, 12 अप्रैल 2015

गाँव का ज़िंदा रहना आपके ज़िंदा होने का सबूत है।

हर एक व्यक्ति के अन्दर एक गाँव होता है । गाँव कोई स्थान विशेष संज्ञा न होकर एक गुणवाचक शब्द है, जिसके अर्थ विस्तृतता में निहित हैं।.गाँव की मर्यादा क्षितिज के सरीखे होती है, जितने उसके  पास आओ उतना ही उसका विस्तार होता जाता है और इस विस्तृतता में रस है, शहद के गंध में भीगी हवायें हैं,जल से भरे बादल हैं, ऊर्जा  से भरी धूप है, उमंगयुक्त गीत है,नेह है,सम्बंध है,संरक्षण है और जीवन है।

सारा गाँव, सारे खेत कियारी, सारे बाग़, सारे ताल, घर, दुआरगोरू, बछरू, चकरोट, कोलिया, पुलिया, सड़क, सेंवार, बबुराही, बँसवारी, परती, नहरा, नालीबरहानार, मोट, लिजुरी, बरारी, इनारा, खटिया, मचिया, लाठी, डंडा, उपरी, कंडा और बचपन जिसे छोड़कर हम शहर चले आए कि बड़ा आदमी बन जायेंगे, बड़ा आदमी बने कि नही बने ये तो नही पता लेकिन  किरायेदार जरुर बन गये । शहर के किरायेदार । रहने खाने का किराया, पानी का किराया, टट्टी-पेशाब का किराया, सडक पर चलने का किराया, किराए के कपड़े, किराए के ओहदे, किराए के रिश्ते, किराये का हँसना, रोना, गाना, बजाना  और  किराये की जिन्दगी।

किरायेदारी के अनुबंध की शर्ते हमेशा  मालिक और गुलाम का निर्माण करती हैं चाहे रूप और नाम कुछ भी हों पर प्रकृति घोर सामंती  ही है। गाँव से निकली गंगा शहरी सीवर में कब बदल जाती है और सीवर पर किराया कब लग जाता है इस पर शोध करने लायक मेरे पास किराया नही है। फिर भी जिन चीजों से अब तक रूबरू हुआ, महसूस किया, जाना समझा उसके आधार पर एक ही निष्कर्ष पर पहुंचता हूँ कि विरासत को बाज़ार का अजगर निगले जा रहा है। बाज़ार हर किसी को किरायेदार बना देना चाहता है । बाज़ार हर आदमी  में शहर बो रहा  है । शहर  आदमी के अन्दर के गाँव को अपनी कुंडली में लपेट कर उसका दम घोंटने पर उतारू है। यह  प्रक्रिया छुतहे  रोग की तरह फैलता जा रहीऔर सारे  लोगों को शहरातू रोगी बनाने पर तुली  है। बड़े शातिर अंदाज में बाजार और शहर  मिलकर गाँव को समेटने के कुचक्र में लगे हैं। पहले बाजारू लासा लगाओ फिर किरायेदार बनाओ और अंत में शहरातू बना कर गाँव से जड़े काट दो। आदमी सूख जाएगा। फिर बाज़ार उसे जलने के लिए शहर की मंडी में सजा देगा।


समस्या का मूल कारण लासा ही है इसी लासा के चलते सारे कबूतर बहेलिये के जाल में फंस गये थे। इसी लासा के चलते धर्मराज अपनी पत्नी को जुए में हार गये थे यही लासा जाने कितने पतंगों को आग में जला डालती है। यही लासा बाजार है यही बाजार शहर है। लासा खींचती है, समेटती है, मारती है । अगर जीवन को  तुरंत के तुरंत समाप्त  करना है तो लासा लगा लो लेकिन अगर जीवन का विस्तार करना है तो अपने अन्दर के गाँव को टटोलो उसे झाड़ पोंछ कर साफ़ करो, खर पतवारों की निराई कर उसे  गीतों से सींचो  फिर देखो जो फसल लहलहाएगी कि आप बाजारू दरिद्र से दानवीर कर्ण बन जायेंगे गाँव का ज़िंदा रहना आपके ज़िंदा होने का सबूत है। क्या आप ज़िंदा हैं?

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

कहानी गाँव गाँव की (यह कहानी नही शब्दशः सत्य है )

हमारे गाँव में गोलारे मिसिर और दुधई मिसिर दो भाई थे। दोनों के पास गाँव की चार आना जमीन थी । गोलारे के दो पुत्र हुए लाले और लुल्ली। दूधई के खानदान में पुट्टू पुकनू पलटू और कलई हुये। इन लोगों के पास कुल मिलाकर सवा सौ बीघे जमीन होगी । गोलारे और दुधई के मरते ही गाँव के लंबरदारों ने उनके बच्चों को समझाया।इतनी सारी जमीनों का कुछ करो नहीं तो चकबंदी के चक्कर में जमीन सरकार ले लेगी या भूदान आन्दोलन के चलते तुम्हारी जमीनें हरिजनों को दे दी जायेंगी। पुट्टू की अगुवाई में जमीन का सबसे सही उपयोग उसे बेंचना समझा गया सो सबने जमीन बेंचना शुरू किया ।

हमारे बाबूजी कहते थे धरती माँ होती है, अपनी जमीन बेंचना माँ को बेचने जैसा है । सूखी रोटी खा लो, पानी पीकर पेट की आग बुझा लो, मुला जमीन को बेचने की बात राम राम पुरखों को का मुंह दिखाओगे?
पर पुट्टू एंड कंपनी धरती माँ को बेंचते गयी । गाँव के लम्बरदार लोग बैनामा करा करा बरफी चांपते गये । एक दिन ऐसा आया कि जमीन के नाम पर इन लोगों के पास कच्चे घर रह गये। फिर हमने कुछ दिनों बाद देखा घर की मिट्टी का कतरा कतरा बिक गया। फिर भूखे मरते पुट्टू, पुकनू, लाले, लुल्ली, कलई और पलटू लंबरदारों के यहाँ रिक्शा चलाने और छान छप्पर छ्हाने मिट्टी काटने और मौसमी मजदूरी का काम करने लगे।
ठीक यही हाल भुल्लुर के लड़के छंगू का हुआ । मुरली के बच्चों मंगरू और सम्हरू का हुआ। पाठक खानदान का हुआ। बबऊ तेवारी का हुआ। अब हालत ये है कि ये सब इंदिरा गांधी आवास योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों को दी जाने वाली गृह सुविधा के तहत बने बदबूदार कोठरियों में रह रहे हैं ।
अब ये भूमिहीन हैं । सरकार ने तो इनकी जमीने नहीं ली ।
इनकी हालत का जिम्मेदार कौन ? सरकार या ये स्वयं या बरफी खाने वाले लम्बरदार? 

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

गंदगी का निस्तारण समस्या का जड़मूल है।


गंदगी का निस्तारण समस्या का जड़मूल है। बाकी बातें अनुशासनहीनता और बेहूदा आदतों से जुडी हैं। एक बात स्पष्ट कर दूँ कि विलासी वर्ग द्वारा जितनी तीव्रता के साथ गंदगी पैदा की जाती है वह अत्यंत खतरनाक है। गरीबों में बेहूदापन हो सकता सभ्य तौर तरीके के विपरीत आचरण हो सकते हैं किन्तु उनका कचरा ऐसी समस्या नही पैदा करता जिसका समाधान न हो।
साबुन शैम्पू , पाउडर, जेल, परफ्यूम कपडे लत्ते, खान पान, रहन सहन, पैकेट, शौचस्नान, यहां तक कि प्रजननरोधी उपकरणो से जो गंदगी पैदा होती है उसके पुनर्चक्रण या निष्पादन के तरीके आधुनिक विज्ञान खोज नही पाया है। इसके अलावा रासायनिक, आणविक, युद्ध के लिए प्रयुक्त सामग्रियों से उत्पन्न कचरे के निपटान की बात तो अभी चिंता का विषय वस्तु ही नही बना।

एक सवाल पर मंथन करेंगे?

घुरहू(काल्पनिक नाम ) अपने अरहर के खेत में रोज सुबह मल विसर्जित करने जाता है। उसका मल दो चार दिन में अपघटकों द्वारा अपघटित कर मिटटी की उर्वरता में बदल दिया जाता है और परिणामस्वरूप फसल को रासायनिक उर्वरकों से बचा कर देश की मुद्रा बचायी जा सकती है।
......या
मिस्टर आर के वर्मा (काल्पनिक नाम )अपनी इटैलियन संडास में जाकर पानी में मल त्याग करते हैं और ढेर सारे टिस्यू पेपर के साथ वह गन्दगी, गंगा -यमुना में विभिन्न बीमारी पैदा करने वाले रोगाणुओं के साथ मिलती है और पवित्र नदियों को दूषित कर देती है। पानी में मानव मल कभी अपघटित नही होता बल्कि पानी के साथ मिलकर हैजा बन जाता है।
दोनों में कौन गंदगी के लिए जिम्मेदार है ? 

गंदगी एक आधुनिक अवधारणा है जिसकी जड़े औद्यौगिक क्रान्ति और विज्ञानवाद में है।  पत्तों पर पानी देकर कुछ समय के लिए पेड़ को चमकदार देखा जा सकता है पर थोड़े दिन बाद पेड़ का सूखना निश्चित है। रही बात विदेशों में साफ़ सफाई का तो उनके यहाँ कचरे की डंपिंग को लेकर जो बवाल हो रहा है उसको हम नही देख पा रहे या देखना नही चाहते।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

कश्मीर में बाढ़ और विकास

विकास का पैमाना मानव की चेतना, सहनशीलता और सामंजस्य करने की क्षमता पर आधारित है इसके पश्चात कोई भी प्रक्रिया सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है।
कश्मीर में लगभग पचास के आस पास झीलें और तालाबों के ऊपर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए। मुम्बई में मीठी नदी की तरह यहाँ भी पानी के परंपरागत निकासी स्रोत्तों पर अतिक्रमण कर उन्हें समाप्त कर दिया गया।
आज प्राकृतिक वस्तुओं पर जिस तरह से अतिक्रमण कर वहाँ होटल, मॉल  बिल्डिंग बनाकर वह की सुंदरता और वहां की जीवोक्रेसी को ख़त्म किया जा रहा प्रकृति का रिएक्शन उसी का परिणाम है।
इन प्राकृतिक आपदाओं के माध्यम से प्रकृति ने अपनी बात मानव के समक्ष रखी है।प्रकृति को विनम्रता पूर्वक समझना और उसके हिसाब से चलने में ही मानव का अस्तित्व कायम रह पायेगा अन्यथा डायनासौर की गति को प्राप्त करने में देर नहीं होगी।


बुधवार, 16 जुलाई 2014

तालाब खतम, पानी खतम, गाँव कैसे ज़िंदा रहेगा ?

हमारे गाँव को तालाबों का गाँव कहा जाता था। 

सिउपूजन दास कहते थे... 

छंगापुरा एक दीप है बसहि गढ़हिया तीर।  
पानी राखो कहि गए सिउपूजन दास कबीर।।  

हमारे गांव के उत्तर की तरफ  बड़का तारा करीब बीस बीघे में फैला हुआ।  फिर पंडा वाला तारा पूरब में दामोदरा और मिसिर का तारा कोने में तलियवा।  पच्छिम में दुर्बासा तारा, दक्खिन में गुड़ियवा तारा। इसके अलावा हर घर के आस पास फैले खाते और बड़े बड़े गड़हे वाटर हार्वेस्टिंग के जबरदस्त स्रोत पूर्वजों द्वारा  आने वाली पीढ़ियों के लिए बनाये गए थे। बाग़ बगीचों से लदा फंदा और पानी से भरे कुंओ और ठंडी ठंडी हवाओं वाला  हमारा गाँव बारहो महीने खुशहाली के गीत गौनही गाता था। 

समय बदला पैंडोरा बॉक्स खुला। लालच और ईर्ष्या के कीट बॉक्स में से निकल कर हमारे गाँव में शहर वाली सड़क और टीवी के रस्ते घुस गए।  

कल मेरा भतीजा आया था बता रहा था कि चाचा अपना कुंआ अब सूख रहा है।  गाँव में तकरीबन सारे कुंये सूख गए हैं।  लोगों ने अब सबमर्सिबल लगवा लिए है बटन दबाया पानी आ गया।  पंडा वाला तालाब को पाट  दिया गया है  वहा दीवार उठा दी गई है। लल्लू कक्का ने घर के सामने का खाता पाट दिया है। गुड़ियवा और तलियये वाला तालाब खेत में बदल गया है।  बाग़ को काट काट लोग लकड़ियां बेंच पईसा बना रहे।  अब गाँव में हर घर टीवी है रोज बैटरी चार्ज कराने को लेकर झगड़ा मचा रहता है।  बाप खटिया में खांसता रहता है बच्चे मोबाइल में  रिमोट से लहंगा उठाने वाला गाना सुनने में मस्त। गाँव में कंक्रीट के चालनुमा मकान सरकारी आवास योजना से बन कर तैयार हो रहे जिसे ग्राम प्रधान कमीशन लेकर बाँट रहा।  हर घर में अलगौझी।  भाई भाई से छोड़िये बाप अलगौझी अऊर अबकी गाँव में छंगू  की मेहरारू  छंगुआ के जेल भिजवाई के केहु अऊर के साथ जौनपुर भागी है। इज्जत आबरू मान मर्यादा सब खत्म। 
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तालाब खतम 
पानी खतम 
गाँव कैसे ज़िंदा रहेगा ?

सोमवार, 26 मई 2014

शैक्षिक गुणवत्ता, मुनाफा और विदक्षता का दुष्चक्र।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था "विदक्षता" (Deskilling) के दुष्चक्र में फंस गयी है।  शैक्षिक प्रसार के नाम पर पूरी  व्यवस्था  को निजी संस्थाओं के हवाले किया जा रहा है।    ऐसे में शैक्षिक गुणवत्ता का स्थान मुनाफे ने ले लिया है। येन केन प्रकरेण मुनाफा प्राप्त करना ही संस्थाओं का अंतिम उद्देश्य बन चुका है। कोई भी शराब बनाने वाला, मिठाई बनाने वाला,कबाड़ व्यापारी, माफिया, नेता, अपराधी  देश हित या समाज हित को आड़ बनाकर पैसे के जोर से शिक्षाविद बन जाते है और महज पैसा बनाने के लिए स्कूल कॉलेज या यूनिवर्सिटी खोल लेते है। 
 लग्जरियस इंफ्रास्ट्रक्चर, फर्जी आंकड़े, फर्जी सूचनाओं एवं दलालो के सहारे कालाबाजारी कर "इन्टेक" पूरा करते है। इस प्रक्रिया में दूर दराज के छात्रों को बहला फुसलाकर उन्हें सुनहरे सपने दिखा कर उन्हें  संस्थाओं में एजेंट को मोटी  रकम देकर एडमिट किया जाता है . फिर उनकी पढ़ाई लिखाई के लिए अकुशल शिक्षक ( हालांकि कागजी  आंकड़ों में ये संस्थान हाई क्वालिफाइड टीचर्स दिखाते है जो अधिकतर उस संस्थान के निरीक्षण के समय भौमिक सत्यापन हेतु मौजूद रहते है और निश्चित रकम लेते है) रखे जाते है। ये अकुशल शिक्षक या तो " फ्रेशर" होते है अल्प जानकारी रखने वाले या कम वेतन पर काम करने को "विवश" लोग। मजे की बात तो यह है कि निजी संस्थाओं में हाई डिग्री होल्डर के ऊपर हमेशा निकले जाने की तलवार लटकती रहती है क्योंकि संस्थान के मालिक को मनोवैज्ञानिक भय होता है की हाई प्रोफाइल टीचर उसके कंट्रोल में नही आएगा और अधिक वेतन की मांग करेगा। इसलिए ये लोग साक्षात्कार के दौरान ही हाई क्वालिफाइड कैंडिडेट को पहले से बाहर कर देते हैं। इस प्रकार एक अकुशलता का चक्र बनता है।  अकुशल शिक्षक के अध्यापन से जो छात्र तैयार होंगे वो भी गुणवत्ता विहीन होंगे और जब ये क्षेत्र में काम करने जाएंगे चाहे वह उत्पादन हो या सेवा क्षेत्र वहा भी गुणवत्ता मानको से नीचे ही रहेगी।  परिणाम यह होगा कि इनके द्वारा निर्मित उत्पाद या दी गई सेवा राष्ट्रीय/ अंतराष्ट्रीय मानको पर खरी नही उतरेगी और प्रतिद्वंदिता में कही पीछे छूट जाएगी।  इसका असर अर्थव्यवस्था पर पडेगा और अर्थव्यवस्था दबाव में आ जाएगी। पुनश्च बड़े पैमाने पर छंटनी की प्रक्रिया में ये अकुशल लोग भारी मात्र में निकाले जाते है जो एक्सपीरियंस के आधार पर किसी न किसी  निजी शैक्षणिक संस्था में फिर पढ़ाने का कार्य करने लगते है वो भी कम वेतन पर। इस प्रक्रिया में अच्छे शिक्षको को नौकरी से हाथ धोना पड़ता है।  यह ठीक उसी तरह से है कि ब्लैक मनी वाइट मनी को चलन से बाहर कर देता है।

फिर वही विदक्षता का दुष्चक्र . 
यहाँ एक बात और गौर   करने लायक है कि इन संस्थाओं में कार्यरत शिक्षक एवं संस्था प्रमुख के बीच सामंत और दास जैसा रिश्ता होता है शिक्षक चाहे कितना भी प्रशिक्षित और योग्य हो संस्था प्रमुख हमेशा उसे हिकारत से देखता है  कई बार उसे उसकी हैसियत याद करवाता है। सारा का सारा खेल मुनाफे का है कुल मिलाकर चाटुकारिता भ्रष्टाचार के सहारे पूंजीपतियों ने शिक्षा व्यवस्था को अत्यंत दूषित एवं भ्रष्ट  कर दिया है जो पूरे देश में फैले भ्रष्टाचार और बिगड़ी अर्थव्यवस्था का मूल कारण है।

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

अपने आँचल में कूड़ा, विष्ठा और जहर को समेटे यमुना

दिल्ली जाते हुये कालिंदी कुंज पुल से जब आप बांयी ओर निगाह डालते हैं तो एक बारगी लगता है कि बजबजाते सीवर के ऊपर से गुजर रहे हो। पिघले तारकोल-सा काली यमुना और उस पर झक सफेद झाग  की मोटी चादर ऐसा लगता है कि  ढेर सारे मरणासन्न जानवर फेंचकुर छोड़ रहे हो। एक कारुणिक दृश्य दिखता है गंदे आर्सेनिक युक्त नाले  और सीवर यहाँ यमुना का नाम प्राप्त कर लेते है और यमुना सफ़ेद झाग के कफ़न में दफ़न हो जाती है।  छोटी और सहायक नदियों के और भी बुरे हाल हैं।  हिंडन नदी जिसके तट पर सैंधव सभ्यता पनपी वह भी कब की मृत घोषित है।  अपने आँचल में कूड़ा, विष्ठा, जहर को समेटे ये नदियां तथाकथित विकास के नीचे दबी अंतिम साँसे लेने को अभिशप्त हैं। 

गर्मी आने वाली है।  पूरे राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र (एन सी आर) में पानी के लिए हाहाकार मचने वाला है। फरीदाबाद से गाजियाबाद तक  भूगर्भ जल विषैला होता जा रहा।  यहाँ पीने का पानी बोतल में मिलता है। कंपनियों की पौ  बारह है।भूजल  का सीधा ताल्लुक पेड़ों  के सूखने से है। जैसे जैसे भूजल नीचे जायेगा या विषैला होगा वैसे ही पेड़ों की जड़े पानी प्राप्त करने में कठिनाई महसूस करेगीऔर पानी के अभाव में या जहर के प्रभाव से  पेड़ सूखने लगेगे।  वह इलाके जहा भूजल खतरनाक ढंग से निम्न स्तर पर पहुच  गया है वहा हरियाली का नामोनिशान ख़तम है। नदियों का जहरीला होना, पानी का कम होना, पारंपरिक तालाबो का ख़तम होना, भूजल के लिए शुभ नहीं। जमीन से इस कदर पानी का दोहन हो रहा कि थोड़े ही दिन में पेट्रोल और पानी के रेट बराबर हो जायेंगे। अभी पानी २५ रूपये लीटर और पेट्रोल ७० रूपये दूध ३० रुपये  है। आज से २५ साल पहले यह कोई  सोच भी नही सकता था। 

शहद के छत्ते गायब , गौरैया के साथ गिद्ध और कौवे भी गायब , खेत खलिहान गायब , घर के आँगन गायब , रिश्ते नाते गायब , गंगा जमुना गायब , मीठे पानी के झरने गायब , विकास ले के चाटोगे ? ये विकास किसके लिए ? कौन इससे लाभान्वित होगा ? अरे अभी ज़िंदा रहने का सवाल है।  कितनी विडम्बना है कि आदमी को मशीन और मशीन को आदमी बनाए जाने का उपक्रम चल रहा है और इसी को विकास कहा जा रहा।  
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हमें नही चाहिए 
बड़े बड़े कारखाने 
जिसमे से निकलता है 
जहरीला धुँआ
और फ़ैल जाता है 
हवाओं में फिर दिल में 
झौंस देता है 
कोमल कोंपलों को 
हमें नही  चाहिए
चाँद की जमीन और पानी  
धरती पर मीठे झरनों को 
मुक्त कर दो 
कोई भी तकनीक जिससे 
मानवता का दलन
और प्रकृति का गलन 
होता है तज दो
बिना किसी भाव के 
बिना किसी लालच के 
आने वाली पीढ़ियों की खातिर। 


मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

सेकुलर/कम्युनल बनाम परहित सरिस धरम नही भाई

किसी भी देश और समाज की कुछ संरचनाये और उन पर आधारित कुछ व्यवस्थाये  होती है जिनके सहारे व्यक्ति के जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित होती है . परिवार, जाति, धर्म संविधान, कानून इत्यादि इन के उदाहरण हैं. ये संरचनाये/व्यवस्थाये जब तक व्यक्ति की आवश्यकताओ की पूर्ति कर रही होती है तभी तक जीवित रहती है जिस दिन उन्होने ऐसा करना छोड दिया उसी दिन गैर प्रासंगिलक और मृत हो जाती है. यदि कोई समाज या देश ऐसी गैरप्रासंगिक और प्रेत व्यवस्थाओ के सहारे चलने की कोशिश करता है तो वह भी उसी प्रेतगति को प्राप्त होने लगता है.

मेरे लिये सेकुलरिज्म और कम्युनलिज्म दो शब्दो से ज्यादा कुछ नही है. इनकी सुविधानुसार व्याख्या ही समस्या का मूल कारण है. इज्म(वाद) ही सारे विवादो का जन्मदाता है. व्यवस्था मे अनरेस्ट पैदा करने वाला है. असत्य प्रयोग के दौरान सेकुलरिज्म भी उतना ही खतरनाक है जितना कि कम्युनलिज्म. जिस भी तथ्य या शब्द को प्रतिष्ठित किया जायेगा वही दूसरे की हीनता मे किसी न किसी तरह का योगदान देने वाला बन जाता है. हर शब्द व्यवस्था वस्तु की अपनी खूबियां होती है उन खूबियों के उपयोग से हम मानवता को सुखी एवम समृद्ध बना सकते है.

चाहे धर्म हो या अन्य कोई सामाजिक संरचना, बजाय कि संरचनागत होने के यदि प्रतिष्ठा के वितरण पर ध्यान केन्द्रित किया जाय और असमान प्रतिष्ठा वितरण पर और उससे होने वाले लाभों पर रोक लगाने की कोशिश की जाय तो वह ज्यादा बेहतर होगा. क्योंकि समाज को चलाने के लिये कोई न कोई संरचना तो चाहिये ही.अब चाहे वह व्यवस्था जाति/धर्म हो या वर्ग/पंथनिर्पेक्षता. यहा मै गान्धी जी को उद्धरित करना चाहुंगा कि एक वकील और एक नाई के कार्यों की प्रतिष्ठा मे अंतर नही होना चाहिये क्योंकि दोनो की बराबर आवश्यकता समाज को है दोनो के बिना व्यवस्था चलाना कठिन होगा. अत: प्रतिष्ठा का मुद्दा मुख्य है बजाय कि साम्रदायिकता या धर्मनिर्पेक्षता.


सवाल इस बात का है कि कोई कैसे किसी जाति,धर्म,समुदाय,वर्ग या लिंग का होने मात्र से प्रतिष्ठित हो जाता है, ऊंचा नीचा हो जाता है? जहां तक मेरा मानना है कि प्रतिष्ठा का एक मात्र आधार होना चाहिये और वह है “परहित”. सेकुलर/कम्युनल के चक्कर मे “परहित छूट जाता है. मेरे लिये मेरे धार्मिक होने मे यही परहित निहित है. परहित सरिस धरम नही भाई. क्योंकि इसी परहित के सहारे हम सामूहिक जीवन को सुनिश्चित कर सकते है और यही बात इस धरती पर मानव जीवन की उत्तरजीविता की गारंटी है. 

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

आम आदमी(Common Man/Mango Man/ Aam Admi) : एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण


"
आम आदमी"  एक सापेक्ष अवधारणा है जो उस व्यक्ति की  ओर संकेत करता है जो तुलनात्मक रूप से "नियंत्रक वर्ग" से नही आता है।  परिवार से लेकर समाज और राज्य में दो प्रकार के वर्ग देखने को मिलते है प्रथम वे जो किसी न किसी प्रकार नीति निर्माण प्रक्रिया में भागीदार होते है, दुसरे वे जो उन नीतियो का पालन करने वाले होते है।  बोलचाल में पहला वर्ग ख़ास या विशिष्ट कहलाता है जबकि दूसरा सामान्य या आम वर्ग कहलाता है इसी के आधार पर इस वर्ग के सदस्यो की पहचान आम या ख़ास आदमी के रूप में होती है। ये वर्ग और इनके सदस्य स्थान समय और परिस्थिति के अनुसार आम और ख़ास में बदलते रहते है।  उदहारण के लिए छात्रों के लिए शिक्षक ख़ास या विशिष्ट होता है किन्तु वही शिक्षक प्रबंध कमेटी के लिए "आम" हो जाता है।  संख्या की दृष्टि से ख़ास वर्ग का आकार छोटा होता है जबकि आम वर्ग अपेक्षाकृत बड़ा होता है। ख़ास लोगो की सहज उपलब्धता ना होना उन्हें और भी निरंतर ख़ास बनाता है, लेकिन कभी कभी इसका अपवाद भी देखने को मिलता है।  

आम से ख़ास होना मानवीय स्वभाव है। प्रत्येक मानव इस प्रयास में होता है कि समाज में एक "पहचान" बनाये।  यही बात उसे विशिष्ट या ख़ास होने को प्रेरित करती है।  किन्तु यही तत्व बाद में वर्ग परिवर्तन का कारक भी बनता है। विशिष्ट होने पर जवाबदेही और जिम्मेदारी सामान्य से अधिक होती है। जब "पद" के अनुसार भूमिका निर्वहन नही की जाती तो सामान्य वर्ग में असंतोष पनपने लगता है इस असंतोष को सामान्य वर्ग में विशिष्टोन्मुखी लोग इसे भांप कर और अधिक टूल देने लगते है और ख़ास लोगो को सामान्य प्रतिभा ,कौशल,जिम्मेदारी और मंतव्य से हीन बताने लगते है। साथ ही वे आम लोगों को अपने विश्वास में लेने लगते है। यहीं पर आम लोगो में एक "ख़ास नेतृत्व" उभरता है जो अपने ख़ास होने का एहसास आम लोगो को नही होने देता और विशिष्ट होने के बावजूद अपने को सामान्य और आम बताता है और इसी मुद्दे के आधार पर ख़ास लोगो को नीति निर्माण प्रक्रिया से बेदखल कर स्वयं नियामक बन जाता है और ख़ास वर्ग में रूपांतरित हो जाता है।  

समाजशास्त्री  परेटो अपनी पुस्तक माइंड  एंड सोसाइटी में दो प्रकार के वर्गों का उल्लेख करते है। शेर के लक्षणो वाला अभिजात्य वर्ग और लोमड़ी के लक्षणो वाला सामान्य वर्ग।  शेर अपने साहस के गुण के कारण उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित रहता है जबकि लोमड़ियाँ धूर्तता के गुण के साथ सामान्य वर्ग में होती हैं। शेर जब सत्ता को धूर्तता के सहारे बनाये रखने की कोशिश करता है तो वह लोमड़ी में बदल जाता है और सामान्य वर्ग में आ जाता है वही कुछ लोमड़ियाँ साहस के सहारे उच्च वर्ग में पहुँच जाती है।  

"आम आदमी सापेक्षिक वंचना का प्रतीक है" यह कथन एकांगी है।  हर आम आदमी में ख़ास आदमी निहित है और हर ख़ास में आम।  दोनों को पृथक पृथक देखने या दिखाने पर प्राप्त निष्कर्ष भ्रामक होते है। सामान्य से विशिष्ट और विशिष्ट से सामान्य होने की प्रक्रिया सतत चलती रहती है।  प्रक्रियागत दोषो को वर्ग या सत्ता व्यवस्था में ढूंढने के बजाय मानव उद्विकास में ढूंढा जाना चाहिए। विशिष्ट होना प्राय: आरोपित शब्द माना जाता है।  यदि विशिष्ट लोग यह अनुभव करें कि उनकी विशिष्टता उनके जिम्मेदारियों के निर्वहन करने की वजह से है तो इस बात से मानव उद्विकास को और गति मिल जायेगी।  यहाँ पर गांधी जी का न्यासिता का सिद्धांत और प्रासंगिक हो जाता है।  विशिष्टता को नकारने से किसी समस्या का समाधान नही होने वाला है वरन उसे स्वीकारते हुए विशिष्ट व्यवस्था जनित अवगुणो के निराकरण से हम आम और ख़ास को एक दूसरे का पूरक बना कर एक सही समाज का निर्माण कर सकते है।  

बुधवार, 15 मई 2013

भूमंडलीकरण, वैश्वीकरण, उदारीकरण बनाम सांस्क़ृतिक संघर्ष

 
वैश्वीकरण शब्द को विश्व की संस्कृतियो अर्थव्यवस्थाओं तथा राज व्यवस्थाओं का एक दूसरे के ऊपर पड़ने वाले प्रभावों जिसमें सात्मीकरण एवं अलगाव दोनों सम्मिलित हैं, के क्रम में समझा जा सकता है।

      वैश्वीकरण के सुविधानुसार कई पर्याय बना दिये गये हैं, जिसमें भूमण्डलीकरण और उदारीकरण प्रमुख हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक ज्या बोद्रिला वैश्वीकरण और भूमण्डलीकरण में अन्तर करते हुए कहते हैं कि ‘‘वैश्वीकरण का सम्बन्ध मानवाधिकार स्वतंत्रता, संस्कृति और लोकतंत्र से है। वहीं भूमण्डलीकरण प्रौद्योगिकी, बाजार, पर्यटन और सूचना से ताल्लुक रखता है।’’ उदारीकरण का तात्पर्य प्रमुखतः अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से है, जिसमें सीमा-शुल्क में भारी कटौती की जाती है ताकि विदेशी सामान सस्ते दरों पर देश में बिक सके।

             राज्य मौलिक अधिकारों के माध्यम से नागरिक अधिकारों की रक्षा की गारण्टी देता है, अनुच्छेद-21 में प्रदत्त जीवन सुरक्षा का अधिकार आपातकाल के दौरान भी नहीं हटाया जा सकता। एक विश्व अर्थव्यवस्था की दिशा में कार्यरत वैश्वीकरण की प्रक्रिया बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के माध्यम से राज्य को कमजोर करती है। ये कम्पनियाँ अपने मुनाफे के लिए एक तरफ राज्य की जैव विविधता एवं पर्यावरण का शोषण करती हैं, दूसरी ओर कमजोर मानवाधिकार कानूनों के कारण स्थानीय व्यक्तियों की स्वतंत्रताओं का हनन करती हैं। वस्तुतः विश्व वित्त बाजार राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के नियंत्रण से काफी हद तक बाहर है। इससे राज्य, समुदाय एवं व्यक्ति की शक्तियों एवं स्वतंत्रताओं का क्षरण हुआ है। राज्य एकपक्षीय बनता जा रहा है, वह बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितों का प्रतिनिधित्व तो कर रहा है किन्तु नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने एवं उनके हितों के प्रतिनिधित्व में असफल हो रहाहै।
 
ठीक यही स्थिति सांस्क़ृतिक तथ्यो से जुडी है संस्कृति सापेक्ष होती है अर्थात् दूसरी संस्कृति की तुलना में किसी और संस्कृति को अच्छा और बुरा नहीं कहा जा सकता है। किन्तु वैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें वृहद परम्परायें, लघु परम्पराओं को दबाने का काम करती है। मीडिया एवं उपनिवेशवादी ताकतों के सहारे स्थानीय संस्कृतियों को उपेक्षणीय बना दिया जाता है, जैसे भारत में अभिजात्यवर्ग या उच्चमध्यमवर्गीय घरों में लोकगीतों का गाया जाना या अन्य सांस्कृतिक तथ्यों को लेकर किया जाने वाला उपेक्षणीय व्यवहार सांस्कृतिक असामन्जस्य क्षेत्रीय संघर्ष को जन्म देता है।
 
 

मंगलवार, 14 मई 2013

नशे के कारोबार मे राज्य की भूमिका

ड्रग्स का उपयोग लगभग उतना ही पुराना है जितनी पुरानी मानव सभ्यता। लेकिन अधिक नशे की लत और खतरनाक सिंथेटिक दवाएं पश्चिमी देशों के द्वारा शुरू किए गए थे, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के आधुनिक युग के दौरान। ड्रग्स दो प्रकार होते हैं साफ्ट और हार्ड,  साफ्ट  ड्रग्स कम नशे की लत और कम हानिकारक है।  हार्ड ड्रग की कठोरता से नशे की तीव्र लत पड जाती  है जो व्यक्ति और समाज के  लिए बहुत अधिक खतरनाक है। साफ्ट ड्रग्स को विभिन्न संस्कृतियों में लोग एक लंबे समय के बाद से इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन तथ्य  यह है कि विभिन्न आधुनिक हार्ड ड्रग्स का आविष्कार द्वितीय विश्व युद्ध और शीत युद्ध के युग के दौरान राज्य एजेंसियों की मदद से किया गया। हार्ड ड्रग का सबसे अधिक लोकप्रिय रूप एल.एस.डी. (lysergic Acid diethylamide)  है जिसकी खोज औद्योगिक रसायनज्ञ अल्बर्ट हॉफमैन ने की थी। एलएसडी का प्रयोग  प्रतिद्वंद्वी देशों के एजेंटों से  महत्वपूर्ण जानकारी को  प्राप्त करने  के लिये शीत युद्ध के दौरान अमेरिकी एजेंसियों द्वारा इस्तेमाल किया गया था। इस उद्देश्य के लिए सीआईए द्वारा कई प्रयोग और  शोध किए गए, सीआईए के निर्देश पर  तीस से अधिक विश्वविद्यालयों और संस्थानों में एक 'व्यापक प्रयोग परीक्षण' कार्यक्रम  शुरु हुआ. इस प्रयोग के दौरान जाने कितने परीक्षण गुप्त रूप से अविकसित देशो और अज्ञात नागरिको पर किये गये. इस प्रक्रिया मे इसी परियोजना से जुडे डा. ओल्सन की मृत्यु भी हुयी. सीआईए कार्यक्रम मुख्यतः MKULTRA के नाम से जाना जाता है,  यह 1950 में शुरू हुआ.
1960 में हिप्पी आंदोलन का पश्चिमी संस्कृति पर गहरा प्रभाव पड़ा, संगीत, कला और युवा अमेरिकियों के हजारों युवा सैन फ्रांसिस्को में इकट्ठा हुये।  हालांकि आंदोलन सैन फ्रांसिस्को में केन्द्रित था, पर प्रभाव दुनिया भर मे पड रहा था. ये हिप्पी आधुनिकता की वर्जनाओ को तोड कर 'फ्रेमलेस जीवन' को अपनाने का प्रयास कर रहे थे, जो राज्य को मंजूर नही था. फलस्वरूप एल एस डी  दवाओं का उपयोग कर के पूरी की पूरी युवा खेप को नशेडी बना देने का संस्थागत प्रयास किया गया।
राज्य नशे का कारोबार बखूबी करता है. प्रथम दृष्टया लगता है कि राज्य एक आदर्शात्मक संस्था है, पर इसे नियंत्रित करने वाले ही इसके चरित्र का निर्माण करते है. इस समय अमेरिका नशे का सबसे बडा कारोबारी है.  अमेरिका सहित तमाम राज्यों दवाओं के  नशे के मुद्दे पर दोहरे मानदंड निम्नलिखित हैं। चाहे इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार न करे किंतु सरकार की छिपी नीतिया इसका घोर समर्थन करती है। अमेरिकी और पाकिस्तान समेत अरब देशो की खुफिया एजेंसियों अपने ‘मुखौटे अभियान’ चलाने के लिए बहुत ज्यादा पूंजी की आवश्यकता होती है। उनको अपने स्थानीय एजेंटोंको  पैसे और हथियार के लिए नशा कारोबर एक सस्ता विकल्प लगता है. ऐसी परिस्थितियों जब राज्य खुद ड्रग्स के धन्धे को प्रमोट करता हो तो भविष्य क्या होगा अनुमान लगाना मुश्किल है कमोबेश आतंकवाद भी एलएसडी ही जैसा है जिसे राज्य ने ही प्रमोट किया हुआ है. यह समस्या एक ही तरीके से कम हो सकती है और वह तरीका उच्च स्तर की अंतरराष्ट्रीय समझ और विभिन्न राज्यों के बीच आम सहमति के माध्यम से ही संभव हो सकता है.
 
 

बुधवार, 8 मई 2013

गंगा प्रदूषण से सम्बन्धित आंकडे और धाराओ की वर्तमान स्थिति

 
गंगा प्रदूषण से सम्बन्धित आंकडे निम्नलिखित है.

१.गंगा में गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक प्रतिदिन १४४.२ मिलियन क्यूबिक मलजल प्रवाहित किया जाता है.
२. गंगा में लगभग ३८४० नाले गिरते है.
३.गंगा तट पर स्थापित औद्योगिक इकाईया प्रतिदिन ४३० मिलियन लीटर जहरीले अपशिष्ट का उत्सर्जन करती है जो सीधे गंगा में बहा दिया जाता है.
४. लगभग १७२.५ हजार टन कीटनाशक रसायन और खाद हर वर्ष गंगा में पहुचता है.
५.वर्तमान समय में गंगा में डालफिन लुप्तप्राय है. उत्तर प्रदेश में मात्र १०० बची है.
६.गंगा किनारे ३ किलोमीटर के दायरे में धोबीघाट पाए जाते है जो ४० से ६० प्रतिशत फास्फोरस डिटर्जेंट के माध्यम से पहुचा रहे है.
७. गंगा बेसिन में केवल १४.३ परसेंट वन शेष रह गए है.
इन सबकी वजह से गंगा की प्रमुख धाराओं की वर्तमान स्थिति अत्यंत दयनीय हो गयी है.अब गंगा कचरे की संस्कृति का प्रतीक बन गयी है
नीचे गंगा से सम्बंधित तकरीबन सभी धाराओं का विवरण दिया गया है...
१ गणेश गंगा (पातालगंगा )---- सूखी
२ गरुड्गंगा ------ सूखी
३ ऋषी गंगा ----- जलस्तर में तेजी से गिरावट
४ रूद्र गंगा ------ विलुप्त
५ धवल गंगा ------ जलस्तर में तेजी से गिरावट
६ विरही गंगा ------ जलस्तर में तेजी से गिरावट
७ खंडव गंगा ----- विलुप्त
८ आकाश गंगा ------ जलस्तर में तेजी से गिरावट
९ नवग्राम गंगा ------ विलुप्त
१० शीर्ष गंगा ----- विलुप्त
११ कोट गंगा ----- विलुप्त
१२ गूलर गंगा ----- जलस्तर में तेजी से गिरावट
१३ हेम गंगा ----- सूखी
१४ हेमवती गंगा ---- विलुप्त
१५ हनुमान गंगा ---- जलस्तर में तेजी से गिरावट
१६ सिध्तारंग गंगा ---- जलस्तर में तेजी से गिरावट
१७ शुद्ध्तारंगिनी गंगा ---- विलुप्त
१८ धेनु गंगा ----- विलुप्त
१९ सोम गंगा ----- विलुप्त
२० अमृत गंगा ----- जलस्तर में तेजी से गिरावट
२१ कंचन गंगा ----- वनस्पति के तीव्र दोहन से गादयुक्त हो गयी है
२२ लक्ष्मण गंगा ------ जलस्तर में तेजी से गिरावट
२३ दुग्ध गंगा ----- विलुप्त
२४ घृत गंगा ----- विलुप्त
२५ रामगंगा ----- तेजी से सूख रही है
२६ केदार गंगा जलस्तर में तेजी से गिरावट               
गंगा के नाम पर अपनी दूकान चलाने वाले गंगा का सर्वनाश करके छोड़ेगे. इस देश में गंगा से कोई प्यार नही करता. नहीं तो ऐसी दुर्दशा पर क्रांति मच जानी चाहिए था. वे जिन्हें तथाकथित नाज है अपनी संस्कृति पर, संस्कृति की आत्मा गंगा की कोई खोज खबर नहीं लेते क्योकि आत्मा नाम की वस्तु आउट आफ डेट हो गयी है.
 

विषमुक्त और शून्य लागत की खेती: 'सैम्पल एक्सपेरीमेंट'

आईआई.टी. मे हुयी मानव मूल्य कार्यशाला के दौरान मै गोपाल उपाध्याय के सम्पर्क मे आया. उन्होने सुभाष पालेकर जी का जिक्र करते हुये मुझे फर्रुखाबाद आने का निमंत्रण दिया. यहा मुझे बाग़डिया जी के द्वारा पालेकर जी के कार्यो की जानकारी मिल चुकी थी. मै बागडिया जी और संतोष भदौरिया के  के संस्थान मे जाकर विषमुक्त खेती का अवलोकन कर चुका था. इन सब से एबात मेरे मन मे पुख्ता तौर पर बैठती जा रही थी कि जो 'हरित क्रांति विकास' का माडल किसानो के लिये प्रचारित किया जा रहा है वह धरती के शोषण पर आधारित है, और आज नही तो कल इसका भयंकर परिणाम भुगतना पडेगा. जैसा कि पंजाब मे अब दिखायी देने लगा है. मैने अपने बडे भईया राजकुमार जी को कानपुर बुलाकर इस विषय पर मंत्रणा की और उन्हे इसके लिये तैयार किया. भाई गोपाल और सुभाष पालेकर का  मार्गदर्शन मिला और हम लोगो ने अपने खेत मे एक 'सैम्पल एक्सपेरीमेंट' किया. 
विषमुक्त खेती मे रासायनिक खाद, कीटनाशक, गोबर का कम्पोस्ट, संकर बीज या हाईब्रीड किस्मो का प्रयोग बिलकुल नही किया जाता. बल्कि गोमूत्र के फर्मेंटेशन के द्वारा एक घोल तैयार किया जाता है जिसके छिडकाव से प्राकृतिक रूप से धरती मे जीवाणु सक्रिय हो जाते है और फसलो के लिये लाभदायक होते है. इसमे पानी का भी इस्तेमाल कम होता है. इस प्रकिया का एक स्लोगन है 'एक गाय देशी दस एकड खेती'.गाय का देशी होना महत्वपूर्ण है. लोग जर्सी को गाय की प्रजाति कहते है पर मेरे हिसाब से यह सुअर प्रजाति है इसे गाय मानना ठीक वैसे है जैसे नीलगाय को गाय मानना. इस खेती से हम पुन: गाय और धरती से अपने सम्बन्ध ठीक कर पायेंगे और इन के आशीर्वाद से  पुन:  हर घर मे दूध घी और अन्नपूर्णा का वास हो सकेगा.
         एक साथ आठ फसले जिसमे सूरजमुखी, मूंग, गन्ना, कद्दू, भिंडी,टमाटर और प्याज और ककडी है,ली जा रही है.
                                                       मूंग
                                                           सूरजमुखी
                                                       विषमुक्त प्याज दिखाते मेरे बडे भाई
                                                 ये बिना रासायनिक खाद के उत्पादित मक्का है
                                                               भिंडी
                                                             कद्दू

                             प्रयोग की सफलता के बाद की मुसकराहट के साथ मै. 

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

औद्योगीकरण और आधुनिकता से हमे क्या मिला? बीस जवाब

औद्योगीकरण और आधुनिकता  से हमे क्या मिला ?
उत्तर निम्नलिखित है ...
1.बडी मशीने
2.बडे सिद्धांत/कम अनुपालन
3.बडे हथियार
4.बडे युद्ध
5.बढी हुयी सुविधाये
6.बढी हुयी तनख्वाह/आनुपातिक कम होती मजदूरी
7.बढी हुयी उम्मीदे
8.मानवीय और प्राकृतिक संसाधनो का अधिकतम दोहन
9.कृत्रिमता
10.दूषित वातावरण
11.दूर दर्शन, दूर गमन, दूर श्रवण
14.सभ्यता और असभ्यता के पूर्वाग्रही पैमाने
15.तार्किकता को भावनाओ से ज्यादा महत्व
16.प्राथमिक अर्थव्यवस्था को दोयम मानना
17.बाजारू चीजो को प्रतिष्ठापरक बनाना
18.लोकतंत्र के बहाने कुलीनतंत्र की स्थापना
19.शक्ति का अधिकतम केन्द्रीकरण
20. सामाजिक संस्थाओ के कार्यो का राज्य को स्थानांतरण
अगर आप इन उत्तरो से संतुष्ट नही है तो हमे सुझाव दीजिये... या फिर कोई जवाब छूट गया हो तो भी की









बुधवार, 10 अप्रैल 2013

नदी प्रदूषण: जीवनदायी नदियों ने अब ओढ़ लिया कफन; इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट

 


यह सदाबहार नजारा है. यमुना का नजदीक से जायजा लेने के लिए आप नोएडा के ओखला बैराज पहुंचें तो पिघले तारकोल-सा काली यमुना का पानी आगरा कैनाल में गिरता दिखेगा. मौके से उठ रही तीखी दुर्गंध नथुनों को बेधते हुए जैसे भेजे में घुस जाती है. बैराज से यमुना की मुख्य धारा में भी एक नाला गिरता है. उस जगह काले पानी पर झक सफेद झग की मोटी चादर है. शायद इसी को नदी का कफन कहते हैं. गंगा, यमुना जैसी नदियों का शहर-दर-शहर यही हाल है. 26 साल से चल रहे गंगा एक्शन प्लान के बाद यह चादर तैयार हुई है. हैरान न हों, इसी प्लान में यमुना और दूसरी सहायक नदियां भी शामिल हैं.
गंगा एक्शन प्लान-1 शुरू हुआ था 1985 में, और 462 करोड़ रु. खर्च करने के बाद 31 मार्च, 2000 को उसे समाप्त मान लिया गया. उसके बाद यमुना और दूसरी नदियों के एक्शन प्लान को एक साथ मिलाकर गंगा एक्शन प्लान-2 शुरू किया गया. इस पर दिसंबर, 2012 तक 2,598 करोड़ रु. से ज्यादा खर्च किए जा चुके हैं. लेकिन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े कहते हैं कि दिल्ली, मथुरा, आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी और पटना से लेकर गंगासागर तक शायद ही कोई शहर ऐसा हो जहां गंगा-यमुना में प्रदूषण का स्तर पहले से रत्ती भर भी कम हुआ हो.
कौन खा गया अरबों रुपए?Yamuna ganga
अरबों रुपए खर्च करने के बाद यह नतीजा? इसका जवाब मिला, और वह भी प्रामाणिक स्रोतों से. आइआइटी कानपुर के पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर डॉ. विनोर तारे ने जवाब के रूप में उछाल दिया यह सनसनीखेज सवाल: ‘‘अजी नदी है कहां, जो साफ की जाए?’’ वे सात आइआइटी की उस संयुक्त विशेषज्ञ टीम के समन्वयक हैं, जिसे केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने ‘‘गंगा रिवर बेसिन एन्वायरनमेंट मैनेजमेंट प्लान’’ तैयार करने का जिम्मा सौंपा है.
नदी आखिर गई कहां? यही सवाल वे हजारों लोग भी उठा रहे थे जो ‘‘यमुना बचाओ यात्रा’’ लेकर पिछले पखवाड़े मथुरा से दिल्ली की सरहद तक आए थे और यमुना के समानांतर नहर बनाने के सरकारी आश्वासन के बाद वापस लौट गए. पर आश्वासन देने वाले और उस पर फौरी तौर पर यकीन करने वाले दोनों जानते हैं कि इस दिलासे से आंदोलन सम्मानजनक ढंग से भले खत्म हो जाए पर एक नदी को बचाने के लिए यह नाकाफी है. इसी तरह का अहसास उन करोड़ों लोगों ने किया जो इस साल कुंभ स्नान करने पहुंचे थे. आंकड़ों को गवाह मानें तो इलाहाबाद में संगम के पास गंगा आज भी उतनी ही गंदी है, जितनी पिछले कुंभ में और उससे भी पिछले कुंभ में थी. चंद दिनों के लिए नदी को साफ रखने से उसकी स्थायी तस्वीर नहीं बदलती.
गंगा एक्शन प्लान को जब जमीन पर उतारा गया, उस समय इलाहाबाद में गंगा में बायो ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) 11.4 मिलीग्राम प्रति लीटर थी. शुरुआत में तो प्लान ने कमाल ही कर दिया, जब 1991 में बीओडी घटकर 2.3 हो गई. लेकिन 2001 में यह फिर उछलकर 5.3 पहुंची और 2010 में 5.51 हो गई. ध्यान रहे कि नहाने लायक पानी में बीओडी 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम ही होनी चाहिए.
यह सूरत बदलती क्यों नहीं? दरअसल अपनी तेज रफ्तार कारों पर इतराती दिल्ली के निजामुद्दीन पुल के नीचे यमुना की पहली आधिकारिक कब्रगाह है. पिछले 15 साल का रिकॉर्ड उठाकर देखें तो यहां कुछ अपवादों को छोड़ यमुना के पानी में घुली ऑक्सीजन की मात्रा शून्य के स्तर पर टिकी हुई है. विज्ञान की भाषा में इसका अर्थ हुआ कि नदी किसी भी तरह के जीवन के लिए अनुकूल नहीं है. यमुना को इस कदर तबाह किया है दिल्ली ने. इसकी बानगी मिलती है डॉ. पूर्णेंदु बोस और विनोद तारे की पर्यावरण मंत्रालय को भेजी शोध रिपोर्ट ‘‘रिवर यमुना इन एनसीआर दिल्ली’’ में. रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि वजीराबाद बैराज के बाद यमुना में जो भी पानी बह रहा है, वह पूरी तरह से सीवेज का पानी है. यानी दिल्ली में यमुना नहीं सिर्फ नाला बहता है. यमुना की जो सूरत दिल्ली में है, वही गंगा की कानपुर और दूसरे शहरों में है.
शहरों का पानी गंदा क्यों?river ganga
इस तरह का प्रदूषण सिर्फ नदियों को ही नष्ट नहीं कर रहा बल्कि इनके किनारे बसे शहरों के भूजल को भी बुरी तरह गंदा कर चुका है. दिल्ली, नोएडा या आगरा में भूजल के खारा या प्रदूषित होने की सबसे बड़ी वजह, इन शहरों में नदी का सूख जाना और उसकी घाटी में सीवर का बहना है. बरसात को छोड़ बाकी दिनों में नदियों में पानी का स्तर भूजल स्तर से नीचा होता है और भूजल नदी में रिसता रहता है. लेकिन नदियों के नष्ट होने के बाद इन शहरों ने भूजल का जबरदस्त दोहन किया और भूजल स्तर नदी के जल स्तर से नीचे चला गया. नतीजारू जो भूजल रिसकर नदी में जाना चाहिए था, वह नदी से उसी की ओर आने लगा.
चूंकि नदियां पूरी तरह प्रदूषित हो चुकी थीं, इसलिए उनकेपानी ने भूजल को भी नहीं बख्शा. तभी तो डॉ. तारे तल्खी भरे शब्दों में कहते हैं, ‘‘हमने नदियों के साथ ही पूरी सभ्यता को मारने की तैयारी कर ली है.’’ जिस तरह यमुना से निकलने वाली अमोनिया गैस त्वचा की बीमारियों को बढ़ावा दे रही है और हाइड्रोजन सल्फाइड गैस भीषण भभका छोड़ रही है, उससे यह बात खुद ही साबित हो जाती है.
इस बीच, नष्ट की जा रही नदियों के बरक्स कुछ लोग इन्हें बचाने को बेचौन हैं. दो साल पहले एक संस्था बनी ‘आइआइटियंस फॉर हॉली गंगा.’ इसमें देश की विभिन्न आइआइटी से निकले और आज प्रतिष्ठित जगहों पर काम कर रहे विशेषज्ञ शामिल थे. उन्होंने नारा दिया: सबके लिए साफ पानी. संस्था के अध्यक्ष यतींद्र पाल सूरी कहते हैं, ‘‘आप पूरे इको-सिस्टम को समझे बिना इस तरह नदियों को नहीं बांध सकते. अविरल गंगा सिर्फ नारा नहीं है, हमारे वक्त की जरूरत है.’’
आर्सेनिक का जहर
इसी जरूरत को बारीकी से समझने के लिए ऋषिकेश के 36 वर्षीय आचार्य नीरज ने 2010 में गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा की पैदल यात्रा की. ऑर्गेनिक केमिस्ट्री में एमएससी करने के बाद धार्मिक कार्य से जुड़े. आचार्य का यह तजुर्बा गौर करने लायक था. इस लंबी यात्रा में लगातार गंगा या उसके पास के हैंडपपों का पानी पीते रहने से उनके शरीर में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ गई.
अपनी उम्र से कहीं बड़े नजर आने वाले आचार्य कहते हैं, ‘‘जमीनी स्तर पर प्रदूषण साफ करने के उपाय कभी लागू हुए ही नहीं. गंगा एक्शन प्लान की नाकामी की यह एक बड़ी वजह रही.’’ आर्सेनिक नाम बेहद जहरीला रासायनिक तत्व गंगा की घाटी के भूजल को किस कदर प्रदूषित कर चुका है, इसका खुलासा जाधवपुर युनिवर्सिटी के प्रो. दीपंकर चक्रवर्ती के 15 साल से चल रहे शोध में लगातार हो रहा है. वह पटना, बलिया, बनारस, इलाहाबाद, कानपुर तक बढ़े हुए आर्सेनिक की पुष्टि कर चुके हैं. ताज्जुब नहीं होगा अगर जल्द ही दिल्ली के पास गढ़ मुक्तेश्वर तक आर्सेनिक की पुष्टि के प्रमाण मिल जाएं.
इन्हीं विसंगतियों पर जब 11 मार्च को राज्यसभा में चर्चा हुई तो वन और पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने माना, ‘‘मैं यह दावा नहीं कर रही कि गंगा एक्शन प्लान के एक-एक पैसे का सही इस्तेमाल हुआ. लेकिन अगर ये प्लान न बने होते तो स्थिति और बुरी हो चुकी होती.’’ मंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि देश के ज्यादातर ट्रीटमेंट प्लांट म्युजियम की तरह खड़े हैं, वे कभी अपना काम कर ही नहीं पाए. समाजवादी पार्टी के सांसद मुनव्वर सलीम ने भी अपनी चिंता जोड़ी कि नदियों को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया जाना चाहिए.
छब्बीस साल से इस दिशा में जो खानापूरी हुई है, उसके चलते अब गंगा-यमुना को बचाने के लिए भागीरथ-से प्रयास और कुबेर के खजाने की जरूरत पडऩे वाली है. पर्यावरण मंत्रालय को भेजी गई आइआइटी कानपुर की रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ दिल्ली में यमुना को साफ करने के लिए 15 साल तक हर साल कम-से-कम 1,217 करोड़ रु. की दरकार है. इसी आंकड़े को आधार मानें तो गंगा-यमुना को पूरी तरह से साफ करने के लिए कम-से-कम एक लाख करोड़ रु. की जरूरत पड़ेगी.
तारे को भरोसा है कि इस साल दिसंबर के अंत तक विशेषज्ञ दल जब रिपोर्ट सौंपेगा तो उसमें भागीरथ प्रयास और कुबेर के खजाने, दोनों का इंतजाम होगा. तब तक यह सवाल अपनी जगह बना रहेगा, जो 11 मार्च को राज्यसभा में बीजेपी सांसद अनिल माधव दवे ने इस शेर के जरिए पूछा था: तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता के काफिला क्यूं लुटा?
                                                                          ...पीयूष बबेले की रिपोर्ट, इंडिया टुडे, 3 अप्रैल2013
 

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

प्रतिमा विसर्जन से मैला हुआ मां का आंचल


जैसा कि मैने अपनी पिछली पोस्टो मे कहा था कि नवरात्रो के बाद गंगा और मैली हो जायेगी, वही हुआ. आज दैनिक जागरण समाचार से  इस बात की पुष्टि होती है. कानपुर के तमाम घाटो की स्थिति पर आधारित यह खबर देखिये और मूर्तिविसर्जन के प्रदूषणकारी परिणामो से अवगत होइये.
"एक मां की मूर्तियों का विसर्जन कर श्रद्धालुओं ने दूसरी मां के आंचल को मैला कर दिया। शहर के सरसैया घाट, गोला घाट, मैस्कर घाट व अन्य घाटों में दुर्गा प्रतिमाओं के अवशेष, प्लास्टिक की थैलियां बिखरी हुई हैं। गंगा की धारा को स्वच्छ बनाने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं पर गंगा की धारा निर्मल नहीं हो पा रही। इसके पीछे कहीं न कहीं हम सभी जिम्मेदार हैं। आस्था के नाम पर दुर्गा पूजा और गणेश उत्सव के बाद गंगा में मूर्तियां का विसर्जन कर मां को गंदा किया गया वहीं मंदिरों में चढ़ाए गए फूल व अन्य पूजन सामग्रियों को भी प्रवाहित कर मोक्षदायिनी के आंचल को मैला किया जा रहा है। जिन घाटों पर स्नान के लिए भक्तों की सर्वाधिक भीड़ होती है, वही घाट सबसे अधिक गंदे हैं। घाटों में हर जगह मूर्तियों के अवशेष पड़े हुए हैं। गणेश उत्सव के बाद गंगा में छोटी बड़ी करीब पांच हजार मूर्तियां गंगा में विसर्जित की गई थीं। भगवान गणेश के गदा, चक्र आदि स्टील के थे तो घाटों पर रहने वालों ने उन्हें निकाल लिया था। पुआल हटाकर लकडि़यों के ढांचे भी लोग ले गए पर वस्त्र उन्होंने घाटों पर ही छोड़ दिए। कुछ ऐसा ही दुर्गा पूजा के बाद हुआ। पांच सौ से अधिक दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन हुआ जिनके अवशेष घाटों के किनारे पड़े हैं। श्रद्धालुओं ने विसर्जन के समय अन्य पूजन सामग्रियां भी प्लास्टिक थैलियों में भरकर फेंक दी थीं। ये प्लास्टिक की थैलियां व वस्त्र घाटों के किनारे ही पड़े हुए हैं। अभी तक उन्हें उठाने को कोई संस्था आगे नहीं आई है।"

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

केवल 1,706 बाघ बचे हैं

देश में बीते नौ महीनों में कम से कम 69 बाघों की मौत हुई है। इनमें से अधिकांश बाघों की मौत दुर्घटना या फिर शिकारियों के कारण हुई है। यह जानकारी राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने शुक्रवार को दी।यह सूचना IBN7 से प्राप्त हुयी है।
एनटीसीए के सहायक महानिरीक्षक राजीव शर्मा ने बताया कि देश के 41 बाघ अभयारण्यों में जनवरी से सितम्बर के बीच 69 बाघों की मौत हुई है। इनमें से 41 की मौत शिकार या फिर किसी दुर्घटना के कारण हुई है, जबकि 28 की प्राकृतिक मौत हुई है।
उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में मृत्यु दर ऊंची है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश में केवल 1,706 बाघ बचे हैं।
 जैसा कि पहले भी मै कह चुका हू  बाघों को सुनियोजित तरीके से नरभक्षी बनाया जाता है फिर उनकी हत्या को वैध रूप प्रदान करने में आसानी हो जाती है. यह सब उस मानवता के नाम पर होता है जो चाँद कागज के टुकडो में बिकती है. बाघों का शिकार बढ़ती मांग का ही नतीजा है .  6 साल पहले बाघ की हड्डियां प्रति किलो 3,000 से 5,000 डॉलर हुआ करती थी। बाघ की हड्डियों का इस्तेमाल कामोत्तेजना बढ़ाने वाले उत्पाद, जोड़ों या हड्डियों की बीमारियों को दूर करने की दवाएं आदि बनाने में किया जाता है। वहीं बाघ के नाखून बुरी शक्तियों को दूर भगाने के लिए लोकप्रिय हैं। इनकी कीमत भी हड्डियों के बराबर ही है। तब से लेकर अब तक इनकी कीमतें 10 से 15 फीसदी बढ़ी हैं।
अरबो  रूपये खर्च होने के बाद  भी बाघों का संरक्षण   चुनौती बना हुआ है।

गुरुवार, 28 जून 2012

गंगा का विकल्प नहीं है



मोक्ष दायनी, जीवन दायनी, पतित पावनी माँ गंगा, हमारे जीवन का आधार माँ गंगा, हमारा पालन पोषण करने वाली माँ गंगा, हमारे पापों को हरने वाली माँ गंगा, हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक साथ देने वाली माँ गंगा/ आज माँ गंगा को हमने खुद मृत्यु के नजदीक ला के खड़ा कर दिया है/ इस के लिए हम किसी दुसरे को दोष नहीं दे सकते है, आज गंगा को इस स्तिथी में लाने वाले हम ही हैं/ हमारा अधिकाधिक बढता उपभोग ही इसके लिए जिम्मेदार है/
माँ गंगा नदी उदगम से लेकर अंत तक लगभग ४० करोड़ लोगों के बीच से होकर गुजरती हैं/ इस मार्ग १०० से भी ज्यादा बड़े शहर एवं लाखों छोटे नगर, कस्बे, गाँव आदि पड़ते हैं/ देश की ४५% जनसँख्या गंगा छेत्र में रहती है, देश का ४७% सिंचित छेत्र गंगा बेसिन में है/ पेयजल, सिंचाई का पानी और आस्था स्नान में गंगा की अपरिहार्यता है, लेकिन यही गंगा तमाम बाधों, तटवर्ती नगरों के सीवेज और औद्योगिक कचरे को ढोने के कारण मरणासन्न है/
आज माँ गंगा जहाँ से निकल रही है वही से प्रदूषित होकर निकल रही है, माँ गंगा के उदगम स्थल पर आज ३०० से अधिक बाँध योजनायें प्रस्तावित हैं/ माँ गंगा को इन बांधों के माध्यम से कैद किया जा रहा है/ 'माँ गंगा तेरा पानी अमृत कल कल बहता जाये' यह बाते अब सिर्फ गीतों तक ही रह जायेंगी/ श्रीनगर क़स्बा, गढ़वाल के पास बनने वाले बांधो की वजह से की वजह से माँ गंगा का प्रवाह अब ५० किलोमीटर तक सुरंग के अन्दर ही रहेगा अब उदगम पे ही माँ गंगा दर्शन के उपलब्ध नहीं हो पाएंगी/ चायगाँव जोशी मठ के पास भी गंगा नदी अब ११ किलोमीटर तक सुरंग के अन्दर ही रहेगी/ अब वहां के निवासियों को अस्थियाँ प्रवाहित करने के लिए भी माँ गंगा नहीं मिलेंगी/ जहाँ गंगा नदी कल कल छल छल बहती थी अब वहां ऐसा लगता है जैसे आप किसी नदी की लाश पे से गुजर रहे हो/ वहां माँ गंगा अब मर चुकी हैं/
देवप्रयाग के पास जहां अलकनंदा और भागीरथी नदियों का संगम होता है वहां बाँध बनाने के लिए १२०० हेक्टेयर का जंगल साफ़ कर दिया गया है, वहां रहने वाले जंगली जानवरों का घर अब उजाड़ दिया गया है किसी को उनकी कोई चिंता नहीं है/ नदियों को सुरंग से ले जाने के कारण उनमे रहने वाले ऊदबिलाव और महर्षि मछलियां शायद अब इतिहास की बात हो जाएँ/
विकास हो रहा है लेकिन शायद एक नदी की लाश पर जिसे हम अपनी माँ कहते हैं/ हमे बिजली चाहिए लेकिन उन जंगली जानवरों के घर उजाड़ कर या उनका अस्तित्व खत्म कर के/ कल यही विकास हमारी और आपकी लाश के उपर से होगा क्यों की ना तो पीने के लिए पानी होगा ना ही सिचाई के लिए/ विद्युत का विकल्प है लेकिन माँ गंगा का विकल्प नहीं है/(आदित्य पालीवाल)