
दुनिया में मात्र ७ % अभिजात्य देशो से ५० % कार्बन का उत्सर्जन होता है. सच यह है कि सुविधाभोगी वर्ग प्रजातंत्र के सहारे सामान्यजन को अपराधबोध से ग्रस्त करता है. और इस शोर शराबे में मूल प्रश्न दबे रह जाते है.
पर्यावरणीय समस्या की गहन पड़ताल अंततः स्थापित तत्कालीन व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़े करती है. यह स्वाभाविक है कि ऐसा कोई भी प्रयास स्थापित शक्तिकेंद्रो(सरकारे) के हितो के अनुकूल नहीं हो सकता. ऐसी स्थिति में ये शक्तिकेंद्र या तो पड़ताल की दिशा मोड़ने का कार्य करते है या दमन का सहारा लेते है. वर्तमान पर्यावरणीय विमर्श में ये दोनों स्थितिया देखी जा सकती है.
हरी धरती शौच हेतु या जहा कपडे का या जल के प्रयोग प्रयोग से काम होता है वहा इस प्रकार के कागजो के प्रयोग न करने का आवाहन करती है. क्योकि इन कागजो को बनाने में जितना पानी खर्च होता है जितने पेड़ काटे जाते है उसका दसवा हिस्सा पानी भी इन कारो में खर्च नहीं होता है.
bilkul alag hi masla uthaya hai aapne achi prastuti
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