शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

कानपुर मे गंगा की दुर्दशा, 2500 करोड का खेल: प्रोफेसर विनोद तारे



कानपुर मे गंगा की धारा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए 2500 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं फिर भी नतीजा सिफर है। पतित पावनी आज भी मैली हैं। कानपुर में गंगा का सबसे बुरा हाल है। यहां 400 करोड़ रुपए से ज्यादा का बजट खर्च हो चुका है फिर भी रोजाना गंगा में गिरने वाले 544.69 एमएलडी सीवरेज कचरे के शोधन की व्यवस्था नहीं है। टेनरी वेस्ट और शहर की गंदगी गंगा में बहाई जा रही है। इसकी सुध नगर निगम और प्रदूषण बोर्ड नहीं ले रहा है। आईआईटी के प्रोफेसर और नेशनल गंगा रिवर बेसिन अर्थारिटी के समन्वयक   के अनुसार गंगा एक्शन प्लान-1 और 2 में 2500 करोड़ रुपए का बजट जारी किया गया था। यह बजट ट्रीटमेंट प्लांट बनाने, चलाने, सफाई और जागरूकता अभियान में खत्म हुआ है फिर भी नतीजा शून्य रहा। गंगा मैली की मैली हैं। 
7000 करोड़ का प्रावधान
गंगा एक्शन प्लान के तहत 1985-2010 के बीच 1000 करोड़ रुपए खर्च हो गए हैं। 1500 करोड़ रुपए की दूसरी किश्त भी जारी हो चुकी है। संबंधित राज्यों का बजट आवंटित कर दिया गया है। यह बजट भी ट्रीटमेंट प्लांट पर खर्च किया जा रहा है। इससे बेहतर नतीजे मिलने की उम्मीद नहीं है। विश्व बैंक, केन्द्र सरकार ने गंगा के लिए 7000 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान किया है। जिसे अगले 10 साल में खर्च किया जाना है।
कन्नौज - वाराणसी के बीच सबसे ज्यादा गंदगी 
- कानपुर में 20 नालों के माध्यम से रोजाना 544.69 एमएलडी सीवरेज कचरा गंगा में गिर रहा है। 544.7 एमएलडी वेस्ट वाटर भी गंगा में जा रहा है। कन्नौज से वाराणसी के बीच लगभग 450 किलोमीटर तक गंगा सबसे ज्यादा प्रदूषित है। यहां से 75 फीसदी म्यूनिसिपल सीवेज और 25 फीसदी औद्योगिक कचरा गंगा में गिरा रहा है। 
रोज 544.69 एमएलडी कचरे का शोधन नहीं 
- जाजमऊ में तीन ट्रीटमेंट प्लान बने हुए हैं। पांच एमएलडी के ट्रीटमेंट प्लांट में चार एमएलडी, 130 एमएलडी के प्लांट में 60 एमएलडी और 36 एमएलडी के प्लांट में 22-26 एमएलडी कचरा जा रहा है, जो मानक से कम है। तीनों ट्रीटमेंट प्लांट को बनाने में 55 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। संचालन में करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं। फिर भी रोजना निकलने वाले 544.69 एमएलडी कचरे का शोधन नहीं हो पा रहा। रोजना 90 एमएलडी कचरा ही शोधित किया जा रहा है। 
फिर करोड़ों का बजट बहाने की तैयारी
- जाजमऊ में 43 एमएलडी, बिनगवां में 210 एमएलडी, बनियापुरवा में 15 एमएलडी और सजारी, सनिगवां में 42 एमएलडी का सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाया जा रहा है, जिसे आईआईटी के वैज्ञानिकों ने बंद करने की सलाह दी है। उनका कहना है कि पहले प्लांट चलाने, रखरखाव के लिए बजट की व्यवस्था कर ली जाए फिर प्लांट बनाया जाए। नहीं तो करोड़ों रुपए का बजट
बेकार जाएगा। भविष्य में पांडु नदी पर 126 एमएलडी, बिनगवां में 115 एमएलडी का ट्रीटमेंट प्लांट बनाया जाना है। यह भी बजट बहाने का तरीका है। 
सहायक नदियां सूखीं, कचरा जमा
- महुआ , काली , रिंद और पांडु नदी सूख गई हैं। इससे गंगा का बहाव कम हो गया है। कचरा जमा हो रहा है। पानी में कीड़े पड़ने लगे हैं। इससे हरिद्वार और कुंभ में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को दिक्कत होती है। गंगा में गिरने वाली घाघरा, राप्ती, कोसी, गंडक, गोमती और यमुना नदी का बहाव भी कम हो गया है। 
गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने का माडल बनाया जा रहा है, जिसे अगले दो साल में पर्यावरण मंत्रालय को सौंपा जाएगा। पहले माडल में ट्रीटमेंट का संचालन पीपीपी माडल पर करने का सुझाव दिया गया है। यूपी के कानपुर सहित 11 राज्य के 200 शहरों में लगे ट्रीटमेंट प्लांट ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। सीवरेज, टेनरी, पेपर मील, डिस्टेलरी, चीनी मिलों का कचरा सीधे गंगा में जा रहा है, जो खतरनाक है। गंगा में मिलने वाली काली नदी और रामगंगा भी प्रदूषण की बड़ी वजह है। इनके पानी के शोधन की व्यवस्था करनी होगी।
.....साभार अमर उजाला


बुधवार, 30 नवंबर 2011

लवकुश आश्रम मे एक दिन.

पिछले रविवार को मै और डॉ पंकज सिंह(हम दोनों एक ही जगह पढ़ाते है) जीवन विद्या से जुड़े संतोष सिंह भदौरिया जी द्वारा स्थापित लवकुश आश्रम का अवलोकन  करने गए थे. यहाँ प्राकृतिक खेती पशुपालन व मानव मूल्यों की शिक्षा दी जाती है. बैल चालित मशीन  से चारा कतरने पानी निकालने व आटाचक्की चलाने  का काम होता है. भदौरिया जी मध्यस्थ दर्शन के प्रवर्तक श्री ए नागराज (अमरकंटक) जी के शिष्य है. नागराज जी का मानना है की इस समय " आदमी को मशीन जैसा बनाया जा रहा है और मशीन को आदमी जैसा." मानव की आत्मनिर्भरता उसके सम्बन्ध पूर्वक जीने में होती है. जब मानव सभी प्राणियों के साथ सह अस्तित्व  को स्वीकार कर लेता है और सह अस्तित्व  में जीना सीख लेगा  है तो वह सुखी हो जाएगा.








                                       

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

सई नदी मृत नदी क्यो? जंगल माफियाओ का कारनामा


सई नदी को मृत नदी के रूप मे तब्दील किया जा चुका है. यह तब्दीली और कही से नही आयी बल्कि वही के लोगो  की वजह से आयी है. मै लगभग ढाई महीने पहले जब नदी के किनारे गया था तो वहा नाम मात्र का पानी था. आस पास के लोगो से बात चीत के आधार पर ज्ञात हुआ कि बरसात के दिनो मे सई का पानी किनारे बसे गावो मे भर जाता है. सई नदी को ध्यान से देखने के बाद मुझे पता चलाकि यह नदी छिछली होती जा रही है. नदी के पुल के इस पार धीरदास  धाम है जहा एक बाबा की समाधि बनी हुयी है. उस पार चुंगी है. हालांकि अब बन्द हो गयी है. चुंगी के नीचे की हलचल देखकर मै वहा देखा तो माजरा समझ मे आया. यहा जंगल माफियाओ क स्वर्ग दिखा मुझे. नदी के किनारे पेडो की कटान अपने चरम पर थी. मैने कैमरा निकाल कर कुछ स्नैप्स लिये. यह देखकर एक मोटा आदमी आकर धमकाने लगा. जल्दी जल्दी कैमरा जेब मे ठूस कर वहा से निकला. धीर दास की ओर जाते हुये मैने सोचा कि इतने सई नदी और बाबा के भक्त लोग यहा है बावजूद इसके इन गुंडो और अपराधिये की रोक टोक करने वाला कोई नही है.

पेड कटने से मिट्टी  स्वतंत्र हो जाती है (जिसको जडे बाधे रहती थी) और नदी मे सीधे पहुचती है फिर नदी की तलहटी मे जमा होती रहती है. जिससे नदी उथली होने लगती है. यही चीज बाद मे नदी के सूखने और बाढ का कारण बनती है.इसी वजह से जीव जंतु और अन्य वनस्पतिया भी विकसित नही हो पाते और नतीजा नदी मृत्यु की ओर बढने लगती है. 




सई के किनारे लकडियो का ढेर 





जंगल कटान मे लगे लोग





कटान मे प्रयुक्त मशीने




 सई नदी का उथलापन 

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

वास्तविक हरित क्रांति का पहला चरण: बैल चालित पम्प


भारत में तकनीकी विकास इतना हो गया हम चाँद और मंगल पर बेस बनाने  की तैयारी में लगे है. किन्तु आज भी लगभग ३० परसेंट जनता दो वक्त की रोटी का इंतजाम बमुश्किल कर पाती है तो ऐसे  में तकनीकी विकास की सार्थकता पर बड़ा  प्रश्नचिन्ह लगता है.

तकनीकी विकास मतलब उपग्रह छोड़ना संकर प्रजाति के बीज बनाना सूचना आदान प्रदान की सहूलियतो  को तीव्र करने  इत्यादि से लगाया जाता है.जबकि विकास पैमाना यह होना चाहिए कि शोषण से कितनी मुक्ति मिली और प्रक्रति से कितना तादात्म्य स्थापित हुआ. 

उपर्युक्त सिद्धांत को अमलीजामा पहनाते हुए कानपुर के वैज्ञानिको और किसानो के मिलेजुले प्रयासों से एक बैल चालित पम्प का विकास किया गया है. बैलो के प्रयोग से एक तरफ जहा डीजल की बहुमूल्य  बचत करके कृषि कार्य को आत्म निर्भता की ओर ले जाया जा सकता है वही ट्रैक्ट्रर के इस्तेमाल करने वाली भारी भरकम लागत से भी निजात पाया जा सकता है. 

इस पम्प की विस्तृत जानकारी इस विडियो के माध्यम से दी गयी है


इस यंत्र की कीमत बोरिंग समेत लगभग 58 हजार रूपये है. सरकार से इस पर सब्सिडी देने क अनुरोध किया गया है किंतु अभी तक कोइ संतोषजनक जवाब नही मिला है. 
इस प्रकार यह स्वदेशी तकनीक है जिसके सहारे हम वास्तव मे हरित क्रांति की ओर सतत रूप से बढ  सकते है.



नोट: इस यंत्र का प्रयोग  कानपुर मे करौली और परियर नामक स्थान पर सफलतापूर्वक किसानो द्वारा किया जा रहा है. यदि किसी को यह अप्प्लीकेशन देखना हो तो वह यहा आकर देख सकता है.

बुधवार, 1 जून 2011

आज मै गंगा प्रदूषण पर किये गए पिछले अध्ययनों के आधार पर यह घोषित कर रहा हूँ कि गंगा सफाई के लिए किये जाने वाले सभी प्रयास बंद कर दिए जाने चाहिए. मिस्टर जयराम रमेश सुन रहे हो ?

आज मै गंगा प्रदूषण पर किये गए पिछले अध्ययनों के आधार पर यह घोषित कर रहा हूँ कि गंगा सफाई  के लिए किये जाने वाले सभी प्रयास बंद कर दिए जाने चाहिए. गंगा को साफ़ करने की कोई जरूरत नही. क्यों?
कारण...
१. बहता हुआ जल अपनी सफाई स्वयं कर लेता है.
२. दरअसल गंगा सफाई अभियान  एक बहुत बड़ा षड्यंत्र और धोखा है. गंगा को साफ़ करना और गंदा करना एक चोखा धंधा बन चुका है जिसमे कार्पोरेट जगत, राजनेता, नौकरशाह, गैर  सरकारी संगठन का कुत्सित गठजोड़ शामिल है. पहले गंगा में गन्दगी फेंकी जाएगी फिर उसे साफ़ करने के लिए फंड आएगा. इस फंड को जारी करने वाली मीटिंग और उसके प्रपोजल  से लेकर जो पैसे खाने का सिलसिला चलता है वह अंत में स्वनाम धन्य गंगाप्रहरियो की तिजोरियो में जाकर विलीन हो जाता है. फिर ज्यादा से ज्यादा गंगा के घाटों पर साफ़ सफाई का काम करके गंगा सफाई की इति श्री कर ली जाती है. गंगा में गन्दगी पूर्ववत. फिर से इस गठजोड़ का रोना पीटना शुरू. फिर फंडिंग. फिर ऐश ही ऐश. ये अंत हीन सिलसिला है. जब तक गंगा की सफाई का कार्यक्रम बंद नही कर दिया जाता.
३.गंगा के स्वच्छ रहने की सबसे बड़ी शर्त यह है कि उसमे गन्दगी न फेकी जाय. गंगा को किसी भी हाल में गन्दा न किया जाय.
४. गंगा में गन्दगी फैलाने पर कठोरतम विधिक व्यवस्था की जानी चाहिए.
५. गंगा जिस भी शहर से होकर गुजरती है उसका मास्टर प्लान ऐसा हो जिससे शहर का कचरा गंगा में न गिरे बल्कि उसका निष्पादन वैज्ञानिक तरीके से हो.
६. एक बार गंगा पर  बने बांधो का पानी छोड़ दिया जाय और गंगा को स्वाभाविक तरीके से कुछ समय के लिए बहने दिया जाय तो पानी के तीव्र बहाव से सारा कचरा बह जाएगा.

वास्तव में गंगा के सफाई करण में पैसे की कोई भूमिका नही है और न ही कोई नया तंत्र बनाने की जरूरत. हमारे पास जो पहले से चली आ रही व्यवस्था है वह पर्याप्त है.

मिस्टर जयराम रमेश सुन रहे हो ?

गुरुवार, 19 मई 2011

भूजल का अंधाधुंध दोहन: वह दिन दूर नही जब सारा देश बंजर रेगिस्तान में बदल जाय

जिस तरह से मनमाने ढंग और लाठी के जोर से   जमीन से पानी खींचा जा रहा है उससे यह लगता है
कि वह दिन दूर नही जब सारा देश बंजर  रेगिस्तान में बदल जाय. देश में हर साल 230 क्यूबिक किमी. भूजल का इस्तेमाल होता है। भारत दुनिया का सबसे ज्यादा भूजल इस्तेमाल करने वाला देश है। भूजल के अंधाधुंध दोहन को रोकने के लिए कोई कारगर कानूनी व्यवस्था न होने से यह मर्ज बढ़ता जा रहा है। देश के सिंचित क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाला 60 फीसदी पानी भूजल स्रोत  पर निर्भर है। पेयजल की 80 फीसदी निर्भरता भूजल पर है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की ओर से देश भर में 2004 में किए गए एक सर्वे के मुताबिक 29 फीसदी ग्राउंडवॉटर ब्लॉक की हालत काफी गंभीर है या उनका जरूरत से ज्यादा दोहन हो रहा है। लेकिन गंभीर संकट यह है कि पिछले एक दशक में जिन वॉटर ब्लॉक का जरूरत से ज्यादा दोहन हो रहा है, उनकी तादाद तीन गुना बढ़ गई है। अब इस दोहन का सीधा ताल्लुक पदों के सूखने से है.जैसे जैसे भूजल नीचे जायेगा वैसे ही पेड़ों की जड़े पानी प्राप्त करने में कठिनाई महसूस करेगी. और पानी के अभाव में पेड़ सूखने लगेगे. वह इलाके जहा भूजल खतरनाक ढंग से निम्न स्तर पर पहुच  गया है वहा हरियाली का नामोनिशान ख़तम है. नदियों का जहरीला होना, पानी का कम होना, पारंपरिक तालाबो का ख़तम होना, भूजल के लिए शुभ नहीं. अगर समय रहते न चेते तो भूजल के खात्मे के साथ मानवता भी ख़तम हो जायेगी. इसमें कोई दो राय नही. 

मंगलवार, 17 मई 2011

मानवाधिकार: एक दुधारी तलवार

      मानव अधिकार की चर्चा होते ही शक्तिबलों और अमानवीय व्यवस्था से पीड़ित निस्सहाय कत्र्तव्यों के चेहरे और उनकी रक्षा के लिए आगे बढ़ते सक्षम हाथों का एक सिलसिला हमारे सामने आता है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था की आत्मा के रूप में मानव अधिकार की अवधारणा को ग्रहण किया जा रहा है। मानवाधिकार 21वीं शताब्दी में एक ताकतवार अवधारणा के रूप में सामने आए हैं। परन्तु हर ताकत की तरह इनके भी नकारात्मक पक्ष से इन्कार नहीं किया जा सकता। अधिकार किसी भी शक्तिशाली शस्त्र के दुरूपयोग की सम्भावना सर्वाधिक तब ही होती है, जब दुरूपयोग की सम्भावनाओं की ओर सबसे कम ध्यान होता है। इसलिए मानवाधिकारों के सर्वाधिक प्रभावी सदुपयोग के लिए आवश्यक है कि मानवाधिकार सम्बन्धी आन्दोलनों के उत्साहपूर्ण प्रवाह में बहते हुए भी इसकी दिशा और सम्भावित संकटों का भली प्रकार विवेचन किया जाए। मानवाघिकार की अवघारणा से जुड़े नकारात्मक संदर्भों के बीज स्वंय इस अवधारणा में ही मिश्रित हैं। मानवाधिकार मूलतः मनुष्य के वे अधिकार हैं जो उसे मानव होने के नाते प्राप्त होनी चाहिए।
      सम्भवतः यह अवधारणा बहुत सरल प्रतीत होती है किन्तु और किया जाए तो एक बड़ी राजनीति शास्त्रीय समस्या से दो चार होना पड़ता है। व्यक्ति के अधिकारों को आधुनिक व्यवस्था में नागरिक के अधिकारों के रूप में प्रत्यक्षीकृत किया गया। नागरिक के अधिकार उसे राज्य का सदस्य होने के नाते राज्य से प्राप्त होते हैं। राज्य वह शक्ति है जो इन अधिकारों को सुनिश्चित करती है। इस शक्ति के अभाव में नागरिक अधिकारों का संरक्षण दुष्कर है। कम से कम प्रजातन्त्र में राज्य की यही उपयोगिता है। वस्तुतः अधिकार की अवधारणा ही शक्ति पर आधारित है। अधिकार की प्राप्ति एवं संरक्षण शक्ति पर निर्भर है-वह वैयक्तिक हो या सामूहिक। वैयक्तिक अधिकारों के सहारे उत्पन्न होने वाले दमन का ही प्रत्युत्तर अथवा समाधान राज्य संरक्षित नागरिक अधिकारों के रूप में प्राप्त होता है। इसीलिए राज्य सर्वोच्च सत्ता के रूप में स्थापित हुआ। राज्य के सामाजिक संविदा के सिद्धान्त की यही मूल आत्मा है। नागरिक अधिकारों का संरक्षण प्रजातांत्रिक व्यवस्था में राज्य का मूल कर्तव्य माना गया।
      अब यहां प्रश्न उठता है कि नागरिक अधिकारों और विधिक अधिकरों के बाद मानवाधिकार की क्या आवश्यकता है।
      इस प्रकार हम पाते हैं कि मानवाधिकार की धारणा प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से राज्य की सत्ता पद प्रश्नाचिन्ह लगती है। राज्य नागरिक-विहीन अधिकारों का संरक्षण करता है। यहां समस्या यह उत्पन्न होती है कि यदि बात अधिकारों की है तो शक्ति चाहिए और यदि वह शक्ति राज्य की नही है तो कौन सी शक्ति होगी - निश्चय ही राज्येतर शक्ति। किसी राज्य की सीमा के अन्तर्गत राज्येतर शक्ति दो प्रकार की हो सकती - आन्तरिक एवं वाहृय। इस प्रकार दो प्रकार की शक्तियों के हस्तक्षेप का मार्ग खुल जाता है - एक तो राज्य विरोधी आन्तरिक शक्तियां और दूसरी अन्य राज्यों की शक्ति। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये दोनों ही स्थितियाँ अपेक्षाकृत कम शक्तिशाली राज्यों हेतु बहुत खतरनाक हैं। यहाँ कहने का यह तात्पर्य नहीं कि मानवाधिकार की चर्चा करने वाले सभी व्यक्ति या संगठन राज्य विरोधी गतिविधियों में लिप्त होते हैं, किन्तु सैद्धान्तिक स्थिति और सम्भावित संकट की उपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐतिहासिक तथ्यों की विवेचना से भी इस संकट की प्राप्ति होती है।
      यदि थोड़ा सा भी ध्यान दिया जाए तो यह देखा जा सकता है कि मानवाधिकारों की चर्चा गत 20-30 वर्षों में अधिक होने लगी है। ऐसा तो नहीं कहा जा सकता की इसके पहले मानवाधिकारों का हनन न था अथवा मानवीय चेतना अल्प-विकसित थी। फिर ऐसा क्या हुआ तीन दशक पूर्व? ध्यान दिया जाना चाहिए कि सोवियत संघ का विघटन नब्बे के दशक की महत्वपूर्ण घटना थी। रूस के विघटन ने यूरोप के भू-राजनीतिक स्वरूप को अचानक बदल दिया। दूसरी ओर विश्व के द्वि-धु्रवीय से एक-धु्रवीय होने की सम्भावनाएँ प्रबल हो गयी। चीन का शक्तिशाली स्वरूप भी तब उभर कर सामने न आया था। द्वितीय महायुद्ध के बाद और शीतयुद्ध के दौरान एक राज्य का दूसरे राज्य के आन्तरिक मामलो में हस्तक्षेप दुष्कर था, क्योंकि हर जगह एक समान शक्तिशाली अन्र्तराष्ट्रीय प्रतिरोध मौजूद होता था। मानवाधिकारों के 1949 के संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र में भी मानवाधिकारों का संरक्षण या केयरटेकर राज्य में ही गया था। चूंकि संयुक्त राष्ट्र संघ और कानून दोनों ही राज्य की सीमा के अन्तर्गत राज्य की प्रभुसत्ता को स्वीकार करते थे, इसलिए किसी राज्य में आन्तरिक हस्तक्षेप को उत्सुक शक्तियों के लिए एक ध्रुवीय विश्व में ऐसा करने में समर्थ थी। ऐसा करने के नैतिक आहार की तलाश थी।
      उपरोक्त दृष्टिबिन्दु को समझने के लिए यूरोप में नाटो राष्ट्रों की कोसोव में हस्तक्षेप की घटना श्रेष्ठ उदाहरण है। मानवाधिकारों के संरक्षण (?) में शक्ति प्रयोग का यह उदाहरण मानवाधिकारों सम्बन्धी विमर्श एवं प्रयासों की दिशा में एक निर्णायक मोड़ हैं। कोसोब समराज्य यूगोस्लाविया की समस्या थी ओर इसका रूप से कोई सम्बन्ध न था। दूसरी ओर नाटो का गठन, विधिक रूप से रूस से उत्पन्न खतरों से नाटों देशों की रक्षा के लिए हुआ था। यूगोस्लाविया नाटो का सदस्य न था। वहाँ के आन्तरिक युद्ध से नाटो देशों को कोई खतरा भी न था। फिर भी नाटों देशों के वहां सैन्य हस्तक्षेप का निर्णय लिया। इसका नैतिक आधार मानवाधिकारों की रक्षा को बनाया गया। समस्याग्रस्त इलाके से जुड़ा एक मात्र नाटो देश ग्रीस था, जिसने इस आयोजन का समर्थन नहीं किया और सैन्य भागीदारी से विरत रहा। फिर भी सैन्य अभियान हुआ और पूरी ताकत से हुआ। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधि वहाँ से हटा लिए गए। अमेरिका सहित नाटो देशों के उत्साहवर्धन, युद्धक विमान, युद्धपोत, प्रक्षेपास्त्र, बमों का प्रचुर प्रयोग वहाँ की रक्षा हेतु किया गया। यूगोस्लाविया की हवाई पट्टियां और सैन्य ठिकाने ही नहीं बल्कि कारखाने, पुल, वाणिज्य केन्द्र भी चुन-चुन कर नष्ट किए गए। शरणार्थियों का समूह भी बमबारी से न बचा। समाचार एजेन्सी के कार्यालय पर बम गिराए गए। चीनी दूतावास भी बमबारी से नष्ट किया गया। यूगोस्लाविया का अर्धतंत्र नष्ट-भ्रष्ट हो गया। इस प्रकार विधिक अधिकार के दायरे से निकलते हुए मानवाधिकारों के रक्षा का प्रथम उपक्रम पूर्ण हुआ। इसके बाद तो यह क्रम रूकने का नाम ही न ले रहा। कभी ईराक तो कभी अफगानिस्तान।
      यहाँ पर हमारा उद्देश्य किसी राष्ट्र विशेष  अथवा अमेरिका को दोषी सिद्ध करना मात्र नहीं है। ध्यातव्य यह है कि अधिकार की रक्षा शक्ति से ही होनी है और यदि विधिक या राज्यीय शक्ति से इतर अपरिभाषित शक्ति के जिम्मे इसे छोड़ दिया जाए तो उस शून्य को अनायास ही कोई भी शक्ति-केन्द्र भरने को प्रस्तुत हो जाएगा और स्वाभाविक कि उस शक्ति केन्द्र के अपने हित भी इस घटना का एक आयाम मात्र है। राज्य विरोधी आन्दोलनों (आतंकवाद सहित) द्वारा मानवाधिकारों का ढाल की तरह प्रयोग आम बात है। इस क्रम में गैर सरकारी संगठनों (एन0जी0ओ0) की उत्साहपूर्ण भागीदारी भी एक आयाम है। मुद्दों के चयन में बड़े शक्ति केन्द्रों के हित प्रभावी होते हैं। कश्मीरी पण्डितों के हितों एवं अधिकारों की उपेक्षा इसका एक उदाहरण है ही, साथ ही इसका भी की ऐसे संगठन मुद्दों के चयन में अन्जाने ही किस प्रकार बड़े शक्ति केन्द्रों पर निर्भर हो जाते हैं। आर्थिक एवं वाणिज्य क्षेत्र में भी इसका प्रयोग अवश्य है और होता है। खुले व्यापार की भरपूर वकालत करते हुए भी किसी दूसरे देश से प्रतिस्पद्र्धी उत्पाद को मानवाधिकार के आधार पर प्रतिबन्धित कर देना एक सरल उपाय है। कुछेक संगठनों का शोर शराबा किसी भी राज्य के आतंकवाद के विरूद्ध अयोग्य की धार को कुंठित करने में समर्थ है। विशेष रूप से तब, जबकि अन्य समर्थ राष्ट्र ऐसा चाह लें।
      संक्षेप में कहा जाए तो एक-ध्रुवीय विश्व मंे सर्वोच्च सत्ता केन्द्र द्वारा राज्य एवं विधि के नियमों के प्रतिबन्ध का उल्लंघन कर वैश्विक हस्तक्षेप के नैतिकीकरण का उपकरण बनने की सम्भावना मानवाधिकार की अवधारणा में निहित है। दूसरी ओर राज्य विरोधी एवं अराजक संगठनों हेतु इन्हें ढाल के रूप में प्रयोग किया जाना सम्भव है।
      अब प्रश्न उठता है कि क्या मानवाधिकार की धारणा ही त्याज्य है? यदि नहीं, तो इसके दुरूपयोग की स्थितियों एवं सम्भावनाओं के निवारण का क्या उपाय हो सकता है?
      वस्तुतः समस्या मानवीयता की भावना एवं धारणा में नहीं, बल्कि अधिकार की धारणा एवं भावना में है। मानवाधिकारों के दुरूप्योग पर विश्व स्तर पर पर्याप्त चर्चा हुई है, किन्तु सुस्पष्ट निष्कर्ष प्राप्त न किया जा सका। इसका कारण कि आधुनिक पाश्चात्य चिन्तन एवं व्यवस्था अधिकार पर आधारित है और अर्थवाद के साथ शक्ति एवं बल जुड़े ही हैं तो फिर दमन को कब तक रोका जा सकता है। इसका समाधान एशियाई और विशेषतः भारतीय चिन्तन में प्राप्त है। यदि प्राचीन भारतीय आचार संहिताओं का गम्भीर अध्ययन हो तो हम पाते हैं कि वहां व्यवस्था का निरूपण कर्तव्यों पर आधारित है। यह सत्य है कि अधिकार एवं कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, किन्तु यह भी सत्य है कि दोनों एक नहीं है। अधिकार की चर्चा अन्ततः संघर्ष की ओर और कर्तव्य की चर्चा सामान्जस्य की ओर ले जाती है। मानवाधिकार की चर्चा, जहां पूर्व में अब तक सर्वमान्य संख्या एवं विधि पर स्थापित व्यवस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह लगती है, वहीं मानवाधिकार का दुरूपयोग सम्पूर्ण मानवीय अधिकार की दिशा के निर्धारण पर प्रश्न-चिन्ह लगाता है। आवश्यकता सुधार की नहीं बदलाव की है - दार्शनिक दृष्टि एवं विश्व व्यवस्था की संकल्पना में बदलाव की।