मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

गंगा से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े

गंगा से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े  
१.गंगा में गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक प्रतिदिन १४४.२
मिलियन क्यूबिक मलजल प्रवाहित किया जाता है.
२. गंगा में लगभग ३८४० नाले गिरते है.
३.गंगा तट पर स्थापित औद्योगिक इकाईया प्रतिदिन ४३० मिलियन लीटर जहरीले अपशिष्ट का उत्सर्जन करती है जो सीधे गंगा में बहा दिया जाता है.

४. लगभग १७२.५ हजार टन कीटनाशक रसायन और खाद  हर वर्ष गंगा में पहुचता है.
५.वर्तमान समय में गंगा में  डालफिन लुप्तप्राय है. उत्तर प्रदेश  में मात्र १०० बची है.
६.गंगा किनारे ३ किलोमीटर के दायरे में धोबीघाट पाए जाते है जो ४० से ६० प्रतिशत फास्फोरस डिटर्जेंट के माध्यम से पहुचा रहे है.
७. गंगा बेसिन में केवल १४.३ परसेंट वन शेष रह गए है.

अब आंकड़ो के अलावा आपसे कुछ कहना है.
इन आंकड़ो को देख कर क्या आपके मन में गंगा के लिए कुछ करने का विचार आया है यदि हां तो अपने आस पास लोगो से गंगा के बारे में चर्चा  कीजिये और इसे व्यावहारिक रूप देने का प्रयास करिए.

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

प्लास्टिक की 'निपटान' एक मिथक है

जब आप शापिंग  करके घर आते हो तो आपके साथ प्लास्टिक की थैलियो में ढेर सारा सामान होता है . तकरीबन हर सामान के लिए प्लास्टिक की थैली होती है आपके पास. आप को पालीथीन काफी सुविधाजनक लगती है. किन्तु आप बहुत बड़ी भूल कर रहे है. आप आने वाली पीढियों के लिए घातक योगदान कर रहे है.वह  योगदान है, प्लास्टिक  प्रदूषण जिसके प्रभाव  की आप कल्पना नहीं करते.
 प्लास्टिक आज के समय का सबसे जहरीला प्रदूषक है. एक गैर सड़नशील जहरीले रसायन युक्त   पदार्थ से निर्मित होने के कारण प्लास्टिक, पृथ्वी, हवा और पानी  हर जगह व्याप्त है. किसी भी तरीके से इसका सुरक्षित निपटान संभव नही है.
प्लास्टिक के  उत्पादन और निपटान के दौरान पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुचाता है प्लास्टिक अपने  उत्पादन के चरण से ही प्रदूषण फैलाता  है.  बेंजीन और विनाइल  क्लोराइड के रूप में प्लास्टिक में मिले होते है जिन्हें  कैंसर का कारण जाना जाता है, जबकि कई अन्य गैसों और तरल हाइड्रोकार्बन कि पृथ्वी और हवा को दूषित करती  है. . हानिकारक प्लास्टिक के उत्पादन के दौरान उत्सर्जित पदार्थों इथाइल  ऑक्साइड बेंजीन, और जैलीन वे प्रमुख रसायन जो वातावरण को  बेहद जहरीला कर रहे हैं और पृथ्वी पर सभी प्रजातियों के लिए  प्राणियों गंभीर खतरा बनते जा रहे  है.  साथ ही साथ इन रसायनों से जन्म दोष, कैंसर,  तंत्रिका तंत्र का क्षरण  और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली, रक्त और गुर्दे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. हैं. प्लास्टिक की रीसाइक्लिंग के दौरान भी यही रसायन दुगुनी मात्र में उत्सर्जित होते है. 
रासायनिक पदार्थों के मामले में  प्लास्टिक की 'निपटान' एक मिथक है. एक बार प्लास्टिक निर्मित होता है तो वह सदा के लिए बना रहता है. प्लास्टिक निपटान करने की  किसी भी तरह  की कोशिश प्रदूषण को और बढ़ाना है.  एक जहरीले कचरे का पुनर्चक्रण केवल खतरनाक सामग्री वापस बाजार में डालना  है जो  अंततः, वातावरण में आकर मिलता है.  - इस प्रकार विषाक्त उपयोग में कोई कमी नहीं आती. प्लास्टिक का जलाना जल में मिलाना जमीन में गाड़ना  इत्यादि से इससे छुटकारा नही पाया जा सकता. इससे यह और प्रदूशाक्कारी के रूप में सामने आता है.
दैनिक जीवन में प्लास्टिक का प्रयोग बिलकुल बंद करना होगा .इसके लिए सरकार और सबसे बड़ी बात जनता को सामने आना होगा अगर  सख्ती के साथ इस समस्या का समाधान करना होगा नहीं तो शायद मानवजाति  का अंत निकट होगा. 

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

गंगा की प्रमुख धाराओं की वर्तमान स्थिति

गंगा की प्रमुख धाराओं की वर्तमान स्थिति  अत्यंत दयनीय है.अब गंगा कचरे की संस्कृति का प्रतीक बन गयी है
नीचे गंगा से सम्बंधित तकरीबन सभी धाराओं का विवरण दिया गया है...



१ गणेश गंगा (पातालगंगा )---- सूखी
२ गरुड्गंगा        ------                सूखी
३ ऋषी गंगा      -----                  जलस्तर में तेजी से गिरावट
४ रूद्र गंगा        ------                 विलुप्त
५ धवल गंगा    ------                 जलस्तर में तेजी से गिरावट
६ विरही गंगा   ------                  जलस्तर में तेजी से गिरावट
७ खंडव गंगा      -----                 विलुप्त
८ आकाश गंगा  ------                जलस्तर में तेजी से गिरावट
९ नवग्राम गंगा  ------                विलुप्त
१० शीर्ष गंगा       -----                 विलुप्त
११ कोट गंगा        -----                विलुप्त
१२ गूलर गंगा       -----               जलस्तर में तेजी से गिरावट
१३ हेम गंगा         -----                सूखी
१४ हेमवती गंगा     ----               विलुप्त
१५  हनुमान गंगा   ----               जलस्तर में तेजी से गिरावट
१६ सिध्तारंग गंगा    ----             जलस्तर में तेजी से गिरावट
१७ शुद्ध्तारंगिनी  गंगा   ----        विलुप्त
१८ धेनु गंगा       -----                  विलुप्त
१९ सोम गंगा        -----                विलुप्त
२० अमृत गंगा      -----               जलस्तर में तेजी से गिरावट 
२१ कंचन गंगा      -----                वनस्पति के तीव्र दोहन से गादयुक्त हो गयी है
२२ लक्ष्मण गंगा      ------            जलस्तर में तेजी से गिरावट 
२३ दुग्ध गंगा      -----                  विलुप्त
२४ घृत गंगा   -----                     विलुप्त
२५ रामगंगा         -----               तेजी से सूख रही है
२६ केदार गंगा                            जलस्तर में तेजी से गिरावट      
गंगा के नाम पर अपनी दूकान चलाने वाले गंगा का सर्वनाश करके छोड़ेगे. इस देश में गंगा से कोई प्यार नही करता. नहीं तो ऐसी दुर्दशा पर क्रांति मच जानी चाहिए था.  वे जिन्हें तथाकथित नाज है  अपनी संस्कृति पर, संस्कृति की आत्मा गंगा की कोई खोज  खबर नहीं लेते क्योकि आत्मा नाम की वस्तु आउट आफ डेट   हो गयी है.          
Ref. The journal of Indian Thought  and Policy research, sep 2010.

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

बाघों के संरक्षण के लिए मातमपुरसी

पिछले 36 महीनो  में उत्तर प्रदेश के जिला खीरी एवं पीलीभीत के जंगलों से बाहर आये  बाघों के द्वारा खीरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी, लखनऊ, फैजाबाद में करीब दो दर्जन के लोग मारे जा  चुके हैं. इसे मानवता के लिए दुखद माना  जाना चाहिए. किन्तु उन बाघों के लिए क्या जिनका  शिकार  मनुष्य कर रहे हैं. बाघ जन्म से हिंस्रक और खूंखार तो होता है, लेकिन नरभक्षी  नहीं होता। बाघ को मानवजनित अथवा प्राकृतिक परिस्थितियां मानव पर हमला करने को विवश करती हैं
प्राकृतिक रूप से खूंखार होने  होने के बाद भी विशेषज्ञों की राय में बाघ किसी पर यूं ही आक्रमण नहीं करता
इसीलिये  वह  बस्ती  से दूर रहकर घने जंगलों में रहता है और तो और  दिन को छुप कर रहता है. । परिस्थियों से मजबूर  होने की वजह से तथा भूख से पीड़ित होने के कारण वह हमला करता है.  जिम कार्बेट का भी कहना था " बाघ बूढ़ा होकर लाचार हो गया हो, जख्मी होने से उसके दांत, पंजा, नाखून टूट गये हो या फिर प्राकृतिक या मानवजनित विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हों, तभी बाघ इंसानों पर हमला करता है।" उनका यह भी मानना था कि जन्म से खूंखार  होने के बावजूद  बाघ मानव पर एक अदृश्य डर के कारण हमला नहीं करता और यह भी कोई जरूरी नहीं है कि नरभक्षी बाघ के बच्चे भी नरभक्षी हो जायें
मेरा अपना विचार है बाघों को सुनियोजित तरीके से नरभक्षी बनाया जाता है फिर उनकी हत्या को वैध रूप प्रदान करने में आसानी हो जाती है. यह सब उस मानवता के नाम पर होता है जो चाँद कागज के टुकडो में बिकती है. बाघों का शिकार बढ़ती मांग का ही नतीजा है .  6 साल पहले बाघ की हड्डियां प्रति किलो 3,000 से 5,000 डॉलर हुआ करती थी। बाघ की हड्डियों का इस्तेमाल कामोत्तेजना बढ़ाने वाले उत्पाद, जोड़ों या हड्डियों की बीमारियों को दूर करने की दवाएं आदि बनाने में किया जाता है। वहीं बाघ के नाखून बुरी शक्तियों को दूर भगाने के लिए लोकप्रिय हैं। इनकी कीमत भी हड्डियों के बराबर ही है। तब से लेकर अब तक इनकी कीमतें 10 से 15 फीसदी बढ़ी हैं।
अरबो  रूपये खर्च होने के बाद  भी बाघों का संरक्षण   चुनौती बना हुआ है। कार्बेट टाइगर रिजर्व में वर्ष 2010 में 3 बाघों की मौत हुई। जबकि एक बाघ को आदमखोर घोषित कर मारने का अभियान चल रहा है।  2009 में इसी  रिजर्व में यह आंकड़ा 6 तक पहुंच गया था।  इसके अलावा वर्ष 2010 में कार्बेट टाइगर रिजर्व  ६ बाघों की प्राकृतिक कारणों की वजह से मारे जाने की बात बतायी गयी ( ढिकाला जोन में 5 जनवरी को आपसी लड़ाई व 11 जनवरी को प्राकृतिक कारण से नर बाघों मौत हुई। 2 जुलाई को कालागढ़ रेंज में पीठ में घाव होने से नर बाघ की मौत हो गई। रामनगर वन प्रभाग में एकमात्र बाघ की मौत 19 अगस्त को कालाढूंगी रेंज में नाले में बहकर होने से हुई। 14 मार्च को उत्तरी जसपुर रेंज में नर बाघ का शव मिला। वहीं 24 नवंबर को दक्षिणी जसपुर रेंज में बीमार हालत में मिले मादा बाघ ने पंतनगर में उपचार के दौरान दम तोड़ दिया।) यह मौतें बाघ संरक्षण के अभियान को तगड़ा झटका देने वाली रही। 
संरक्षण के नाम पर अघिक आर्थिक मदद स्वीकृत कराने के फेरे में विभाग बाघों की संख्या गलत बताता आ रहा है। इनके जानकार कम होने से वे सभी को गुमराह कर देते हैं।
ऐसे में बाघों के संरक्षण के लिए सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर चलाई जाने वाली परियोजनाए या गैर सरकारी संगठनो की मातमपुर्सी मज़ाक नहीं तो और क्या है.

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

गंगा तिल-तिल कर मर रही है

गंगा का पानी अब अपने प्रदूषण के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। गंगा सफाई से जुड़े प्रो. वीर भद्र मिश्र की के अनुसार  तो  गंगा में फिकल क्वालिफार्म की संख्या वर्तमान समय में प्रति 100 सी सी पानी में 60 हजार बैक्टीरिया है और वी.ओ.डी की मात्रा चार पांच मिली ग्राम प्रति लीटर है, जबकि यह तीन से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
 वाराणसी में आदि केशव घाट पर यही फिकल क्वालिफार्म डेढ़ लाख प्रति सौ सीसी पानी में हैं, जबकि वी.ओ.डी की मात्रा 22 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में है। अगर एक लाइन में कहा जाय तो गंगा अब मरने के कगार पर पहुंच चुकी है। वह दिन दूर नहीं जब गंगा इतिहास के पन्नों में सरस्वती नदी की तरह कहीं खो जाएंगी।

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में गंगा प्रयोगशाला के हेड प्रो. यू.सी चौधरी ने तो यहां तक कह दिया है कि गंगा में आक्सीजन की मात्रा अब तक के निम्नतर स्तर पर है, क्योंकि टिहरी में गंगा के पानी को रोक तो दिया गया है लेकिन गंदे नालों का पानी गंगा में लगातार गिर रहा है जिससे आक्सीजन की मात्रा लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने बेबाक लहजों में कहा की यदि अब गंगा को बचाने का ठोस प्रयास नहीं किया गया तो गंगा को कोई नहीं बचा
 सकता है।

द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद का कहना है कि 'नदी बेगे न शुद्धते', अर्थात जिस नदी में धारा नहीं होगी उसकी गुणवत्ता भी समाप्त हो जाएगी। रक्षत गंगाम आन्दोलन के प्रणेता राम शंकर सिंह का कहना है कि टिहरी से गंगा को मुक्त कर दिया जाए और शहरों के गंदे नाले गिरने बंद हो जाएं तभी गंगा बच सकती है वरना इसे बचाना संभव नहीं है।

एक नज़र इधर

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गंगा प्रदूषण रोकने के लिए एक विशाल मलशोधन संयंत्र लगाने, घाटों के नवीकरण और अन्य उपायों के संबंध में 497 करोड़ रुपये की एक महत्वाकांक्षी योजना को आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमिटी ने मंजूरी दी।
अब इन रूपयों की गंगा सरकारी बाबुओ हाकिमो नेताओ के घर में बहेगी और वह से और प्रदूषित होकर फिर भागीरथी में मिल जायेगी.
भारत की जीवन रेखा कही जाने वाली गंगा तिल-तिल कर मर रही है लेकिन उसके तथाकथित पुत्र उसे चुप-चाप मरते हुए देख रहे हैं और गंगा कि दुर्दशा ऐसी तब है जब गंगा एक्शन प्लान का दूसरा चरण चल रहा है। कहना न होगा कि गंगा सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये अब तक बहाए जा चुके हैं लेकिन वही हालत है कि 'ज्यों-ज्यों दावा की त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता गया'। गंगा सफाई के सरकारी प्रयास के अलावा कम से कम तीन दर्जन एनजीओ वाराणसी में ऐसे हैं, जो दसों साल से गंगा प्रदूषण का राग अलाप रहे हैं लेकिन गंगा में प्रदूषण रोकने के लिए प्रयास नहीं किए।

सोमवार, 24 जनवरी 2011

हे मनुज कुछ सोच तो तू, क्या धरा को दे रहा

हरी धरती के चाहने वाले हरिद्वार के रहने वाले हरीश जी के जज्बात से रूबरू होइए. इनके सवालात सार्वभौमिक है पर्यावरण का बचना इनके सवालो के जवाबो में है 

 दोस्तो अपने चारों ओर नज़र करता हूँ तो पाता हूँ की कंकरीटी सभ्यता का विस्तार निगल लेने को आतुर हैं हमे दिन-ब- दिन, विकास की बहुत बड़ी कीमत हैं ये, ओर इसके लिए मैं खुद को ज़िम्मेदार मानता हूँ शायद आप भी मुझसे सहमत हों




हे मनुज कुछ सोच तो तू क्या धरा को दे रहा
प्रकृति मैं विष घोल कर तू प्राण वायु ले रहा!!

नग्न से दिखते ये जंगल, माफ़ तो क्योंकर करेंगे
वो जो उजड़े हैं जड़ों से, घौसले कैसे बसेंगे,
कर औरोको मझधार मैं, अपनी ही कश्ती खे रहा
हे मनुज कुछ सोच तो तू, क्या धरा को दे रहा!!

जंगलों को काट कर जो, बस्तियाँ तूने बसाई
वैभवका हर समान था, घरमैं मगर खुशियाँ नआई
तेरे ही तो पाप हैं पगले, तू जिनको धो रहा
हे मनुज कुछ सोच तो तू, क्या धरा को दे रहा

इन धधकती चीमनियों के, दंश से कैसे बचोगे
बच भी गये गर मौत से पर, पीडियों विकृत रहोगे!!
दोष किसको देगा जब, खुद ही तू काँटे बो रहा
हे मनुज कुछ सोच तो तू, क्या धरा को दे रहा!!

अब ना चेते तो धरा की, परतों मैं खोदे जाओगे
डायनासोरों की तरह, क़िस्सों मैं पाए जाओगे!!
यम तेरे सर पर खड़ा, तू हैं की ताने सो रहा
हे मनुज कुछ सोच तो तू, क्या धरा को दे रहा!!

वक्त हैं अबभी संभल, मततोड़ प्रकृति संतुलन को
जो भी जैसा हैं वही, रहने दे इस पर्यावरण को
वरना फिर भगवान भी, तुझको बचाने से रहा!!
हे मनुज कुछ सोच तो तू, क्या धरा को दे रहा
प्रकृति मैं विष घोल कर तू प्राण वायु ले रहा!!

रविवार, 23 जनवरी 2011

कागजो से शौच बनाम पर्यावरण चेतना फैलाने हेतु दौड़ या रैली का आयोजन

आजकल पर्यावरण चेतना फैलाने हेतु दौड़  या रैली निकालने का बड़ा चलन है. सवाल यह है कि इस दौड़ में भाग कौन लेता है? इसमें बड़े बड़े पूजीपति उद्योगपति अभिजात्य तबके के लोग जोर शोर से भाग लेते है. ये लोग खुद तो दौड़ कर क्या दिखाना चाहते है. हरी धरती के सबसे बड़े शत्रु यही लोग है. शौच के लिए पानी नहीं उत्तम कोटि के कागजो  का प्रयोग करते  है फिर पेड़ो को बचाने के लिए रैली का आयोजन करेगे.
दुनिया में मात्र ७ % अभिजात्य देशो से ५० % कार्बन का उत्सर्जन होता है. सच यह है कि सुविधाभोगी वर्ग प्रजातंत्र के सहारे सामान्यजन को अपराधबोध से ग्रस्त करता है. और इस शोर शराबे में मूल प्रश्न दबे रह जाते है.
पर्यावरणीय समस्या की गहन पड़ताल अंततः स्थापित तत्कालीन व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़े करती है. यह स्वाभाविक है कि ऐसा कोई भी प्रयास स्थापित शक्तिकेंद्रो(सरकारे) के हितो के  अनुकूल नहीं हो सकता. ऐसी स्थिति में ये शक्तिकेंद्र या तो पड़ताल की दिशा मोड़ने का  कार्य करते है या दमन का सहारा लेते है. वर्तमान पर्यावरणीय विमर्श में ये दोनों स्थितिया देखी जा सकती है. 
हरी धरती शौच हेतु या जहा कपडे का या जल के  प्रयोग  प्रयोग से काम होता है वहा इस प्रकार के कागजो के प्रयोग न  करने का आवाहन करती है. क्योकि इन कागजो को बनाने में जितना पानी खर्च होता है जितने पेड़ काटे जाते है उसका दसवा हिस्सा पानी भी इन कारो में खर्च नहीं होता है.