बुधवार, 8 मई 2013

गंगा प्रदूषण से सम्बन्धित आंकडे और धाराओ की वर्तमान स्थिति

 
गंगा प्रदूषण से सम्बन्धित आंकडे निम्नलिखित है.

१.गंगा में गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक प्रतिदिन १४४.२ मिलियन क्यूबिक मलजल प्रवाहित किया जाता है.
२. गंगा में लगभग ३८४० नाले गिरते है.
३.गंगा तट पर स्थापित औद्योगिक इकाईया प्रतिदिन ४३० मिलियन लीटर जहरीले अपशिष्ट का उत्सर्जन करती है जो सीधे गंगा में बहा दिया जाता है.
४. लगभग १७२.५ हजार टन कीटनाशक रसायन और खाद हर वर्ष गंगा में पहुचता है.
५.वर्तमान समय में गंगा में डालफिन लुप्तप्राय है. उत्तर प्रदेश में मात्र १०० बची है.
६.गंगा किनारे ३ किलोमीटर के दायरे में धोबीघाट पाए जाते है जो ४० से ६० प्रतिशत फास्फोरस डिटर्जेंट के माध्यम से पहुचा रहे है.
७. गंगा बेसिन में केवल १४.३ परसेंट वन शेष रह गए है.
इन सबकी वजह से गंगा की प्रमुख धाराओं की वर्तमान स्थिति अत्यंत दयनीय हो गयी है.अब गंगा कचरे की संस्कृति का प्रतीक बन गयी है
नीचे गंगा से सम्बंधित तकरीबन सभी धाराओं का विवरण दिया गया है...
१ गणेश गंगा (पातालगंगा )---- सूखी
२ गरुड्गंगा ------ सूखी
३ ऋषी गंगा ----- जलस्तर में तेजी से गिरावट
४ रूद्र गंगा ------ विलुप्त
५ धवल गंगा ------ जलस्तर में तेजी से गिरावट
६ विरही गंगा ------ जलस्तर में तेजी से गिरावट
७ खंडव गंगा ----- विलुप्त
८ आकाश गंगा ------ जलस्तर में तेजी से गिरावट
९ नवग्राम गंगा ------ विलुप्त
१० शीर्ष गंगा ----- विलुप्त
११ कोट गंगा ----- विलुप्त
१२ गूलर गंगा ----- जलस्तर में तेजी से गिरावट
१३ हेम गंगा ----- सूखी
१४ हेमवती गंगा ---- विलुप्त
१५ हनुमान गंगा ---- जलस्तर में तेजी से गिरावट
१६ सिध्तारंग गंगा ---- जलस्तर में तेजी से गिरावट
१७ शुद्ध्तारंगिनी गंगा ---- विलुप्त
१८ धेनु गंगा ----- विलुप्त
१९ सोम गंगा ----- विलुप्त
२० अमृत गंगा ----- जलस्तर में तेजी से गिरावट
२१ कंचन गंगा ----- वनस्पति के तीव्र दोहन से गादयुक्त हो गयी है
२२ लक्ष्मण गंगा ------ जलस्तर में तेजी से गिरावट
२३ दुग्ध गंगा ----- विलुप्त
२४ घृत गंगा ----- विलुप्त
२५ रामगंगा ----- तेजी से सूख रही है
२६ केदार गंगा जलस्तर में तेजी से गिरावट               
गंगा के नाम पर अपनी दूकान चलाने वाले गंगा का सर्वनाश करके छोड़ेगे. इस देश में गंगा से कोई प्यार नही करता. नहीं तो ऐसी दुर्दशा पर क्रांति मच जानी चाहिए था. वे जिन्हें तथाकथित नाज है अपनी संस्कृति पर, संस्कृति की आत्मा गंगा की कोई खोज खबर नहीं लेते क्योकि आत्मा नाम की वस्तु आउट आफ डेट हो गयी है.
 

विषमुक्त और शून्य लागत की खेती: 'सैम्पल एक्सपेरीमेंट'

आईआई.टी. मे हुयी मानव मूल्य कार्यशाला के दौरान मै गोपाल उपाध्याय के सम्पर्क मे आया. उन्होने सुभाष पालेकर जी का जिक्र करते हुये मुझे फर्रुखाबाद आने का निमंत्रण दिया. यहा मुझे बाग़डिया जी के द्वारा पालेकर जी के कार्यो की जानकारी मिल चुकी थी. मै बागडिया जी और संतोष भदौरिया के  के संस्थान मे जाकर विषमुक्त खेती का अवलोकन कर चुका था. इन सब से एबात मेरे मन मे पुख्ता तौर पर बैठती जा रही थी कि जो 'हरित क्रांति विकास' का माडल किसानो के लिये प्रचारित किया जा रहा है वह धरती के शोषण पर आधारित है, और आज नही तो कल इसका भयंकर परिणाम भुगतना पडेगा. जैसा कि पंजाब मे अब दिखायी देने लगा है. मैने अपने बडे भईया राजकुमार जी को कानपुर बुलाकर इस विषय पर मंत्रणा की और उन्हे इसके लिये तैयार किया. भाई गोपाल और सुभाष पालेकर का  मार्गदर्शन मिला और हम लोगो ने अपने खेत मे एक 'सैम्पल एक्सपेरीमेंट' किया. 
विषमुक्त खेती मे रासायनिक खाद, कीटनाशक, गोबर का कम्पोस्ट, संकर बीज या हाईब्रीड किस्मो का प्रयोग बिलकुल नही किया जाता. बल्कि गोमूत्र के फर्मेंटेशन के द्वारा एक घोल तैयार किया जाता है जिसके छिडकाव से प्राकृतिक रूप से धरती मे जीवाणु सक्रिय हो जाते है और फसलो के लिये लाभदायक होते है. इसमे पानी का भी इस्तेमाल कम होता है. इस प्रकिया का एक स्लोगन है 'एक गाय देशी दस एकड खेती'.गाय का देशी होना महत्वपूर्ण है. लोग जर्सी को गाय की प्रजाति कहते है पर मेरे हिसाब से यह सुअर प्रजाति है इसे गाय मानना ठीक वैसे है जैसे नीलगाय को गाय मानना. इस खेती से हम पुन: गाय और धरती से अपने सम्बन्ध ठीक कर पायेंगे और इन के आशीर्वाद से  पुन:  हर घर मे दूध घी और अन्नपूर्णा का वास हो सकेगा.
         एक साथ आठ फसले जिसमे सूरजमुखी, मूंग, गन्ना, कद्दू, भिंडी,टमाटर और प्याज और ककडी है,ली जा रही है.
                                                       मूंग
                                                           सूरजमुखी
                                                       विषमुक्त प्याज दिखाते मेरे बडे भाई
                                                 ये बिना रासायनिक खाद के उत्पादित मक्का है
                                                               भिंडी
                                                             कद्दू

                             प्रयोग की सफलता के बाद की मुसकराहट के साथ मै. 

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

औद्योगीकरण और आधुनिकता से हमे क्या मिला? बीस जवाब

औद्योगीकरण और आधुनिकता  से हमे क्या मिला ?
उत्तर निम्नलिखित है ...
1.बडी मशीने
2.बडे सिद्धांत/कम अनुपालन
3.बडे हथियार
4.बडे युद्ध
5.बढी हुयी सुविधाये
6.बढी हुयी तनख्वाह/आनुपातिक कम होती मजदूरी
7.बढी हुयी उम्मीदे
8.मानवीय और प्राकृतिक संसाधनो का अधिकतम दोहन
9.कृत्रिमता
10.दूषित वातावरण
11.दूर दर्शन, दूर गमन, दूर श्रवण
14.सभ्यता और असभ्यता के पूर्वाग्रही पैमाने
15.तार्किकता को भावनाओ से ज्यादा महत्व
16.प्राथमिक अर्थव्यवस्था को दोयम मानना
17.बाजारू चीजो को प्रतिष्ठापरक बनाना
18.लोकतंत्र के बहाने कुलीनतंत्र की स्थापना
19.शक्ति का अधिकतम केन्द्रीकरण
20. सामाजिक संस्थाओ के कार्यो का राज्य को स्थानांतरण
अगर आप इन उत्तरो से संतुष्ट नही है तो हमे सुझाव दीजिये... या फिर कोई जवाब छूट गया हो तो भी की









बुधवार, 10 अप्रैल 2013

नदी प्रदूषण: जीवनदायी नदियों ने अब ओढ़ लिया कफन; इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट

 


यह सदाबहार नजारा है. यमुना का नजदीक से जायजा लेने के लिए आप नोएडा के ओखला बैराज पहुंचें तो पिघले तारकोल-सा काली यमुना का पानी आगरा कैनाल में गिरता दिखेगा. मौके से उठ रही तीखी दुर्गंध नथुनों को बेधते हुए जैसे भेजे में घुस जाती है. बैराज से यमुना की मुख्य धारा में भी एक नाला गिरता है. उस जगह काले पानी पर झक सफेद झग की मोटी चादर है. शायद इसी को नदी का कफन कहते हैं. गंगा, यमुना जैसी नदियों का शहर-दर-शहर यही हाल है. 26 साल से चल रहे गंगा एक्शन प्लान के बाद यह चादर तैयार हुई है. हैरान न हों, इसी प्लान में यमुना और दूसरी सहायक नदियां भी शामिल हैं.
गंगा एक्शन प्लान-1 शुरू हुआ था 1985 में, और 462 करोड़ रु. खर्च करने के बाद 31 मार्च, 2000 को उसे समाप्त मान लिया गया. उसके बाद यमुना और दूसरी नदियों के एक्शन प्लान को एक साथ मिलाकर गंगा एक्शन प्लान-2 शुरू किया गया. इस पर दिसंबर, 2012 तक 2,598 करोड़ रु. से ज्यादा खर्च किए जा चुके हैं. लेकिन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े कहते हैं कि दिल्ली, मथुरा, आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी और पटना से लेकर गंगासागर तक शायद ही कोई शहर ऐसा हो जहां गंगा-यमुना में प्रदूषण का स्तर पहले से रत्ती भर भी कम हुआ हो.
कौन खा गया अरबों रुपए?Yamuna ganga
अरबों रुपए खर्च करने के बाद यह नतीजा? इसका जवाब मिला, और वह भी प्रामाणिक स्रोतों से. आइआइटी कानपुर के पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर डॉ. विनोर तारे ने जवाब के रूप में उछाल दिया यह सनसनीखेज सवाल: ‘‘अजी नदी है कहां, जो साफ की जाए?’’ वे सात आइआइटी की उस संयुक्त विशेषज्ञ टीम के समन्वयक हैं, जिसे केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने ‘‘गंगा रिवर बेसिन एन्वायरनमेंट मैनेजमेंट प्लान’’ तैयार करने का जिम्मा सौंपा है.
नदी आखिर गई कहां? यही सवाल वे हजारों लोग भी उठा रहे थे जो ‘‘यमुना बचाओ यात्रा’’ लेकर पिछले पखवाड़े मथुरा से दिल्ली की सरहद तक आए थे और यमुना के समानांतर नहर बनाने के सरकारी आश्वासन के बाद वापस लौट गए. पर आश्वासन देने वाले और उस पर फौरी तौर पर यकीन करने वाले दोनों जानते हैं कि इस दिलासे से आंदोलन सम्मानजनक ढंग से भले खत्म हो जाए पर एक नदी को बचाने के लिए यह नाकाफी है. इसी तरह का अहसास उन करोड़ों लोगों ने किया जो इस साल कुंभ स्नान करने पहुंचे थे. आंकड़ों को गवाह मानें तो इलाहाबाद में संगम के पास गंगा आज भी उतनी ही गंदी है, जितनी पिछले कुंभ में और उससे भी पिछले कुंभ में थी. चंद दिनों के लिए नदी को साफ रखने से उसकी स्थायी तस्वीर नहीं बदलती.
गंगा एक्शन प्लान को जब जमीन पर उतारा गया, उस समय इलाहाबाद में गंगा में बायो ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) 11.4 मिलीग्राम प्रति लीटर थी. शुरुआत में तो प्लान ने कमाल ही कर दिया, जब 1991 में बीओडी घटकर 2.3 हो गई. लेकिन 2001 में यह फिर उछलकर 5.3 पहुंची और 2010 में 5.51 हो गई. ध्यान रहे कि नहाने लायक पानी में बीओडी 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम ही होनी चाहिए.
यह सूरत बदलती क्यों नहीं? दरअसल अपनी तेज रफ्तार कारों पर इतराती दिल्ली के निजामुद्दीन पुल के नीचे यमुना की पहली आधिकारिक कब्रगाह है. पिछले 15 साल का रिकॉर्ड उठाकर देखें तो यहां कुछ अपवादों को छोड़ यमुना के पानी में घुली ऑक्सीजन की मात्रा शून्य के स्तर पर टिकी हुई है. विज्ञान की भाषा में इसका अर्थ हुआ कि नदी किसी भी तरह के जीवन के लिए अनुकूल नहीं है. यमुना को इस कदर तबाह किया है दिल्ली ने. इसकी बानगी मिलती है डॉ. पूर्णेंदु बोस और विनोद तारे की पर्यावरण मंत्रालय को भेजी शोध रिपोर्ट ‘‘रिवर यमुना इन एनसीआर दिल्ली’’ में. रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि वजीराबाद बैराज के बाद यमुना में जो भी पानी बह रहा है, वह पूरी तरह से सीवेज का पानी है. यानी दिल्ली में यमुना नहीं सिर्फ नाला बहता है. यमुना की जो सूरत दिल्ली में है, वही गंगा की कानपुर और दूसरे शहरों में है.
शहरों का पानी गंदा क्यों?river ganga
इस तरह का प्रदूषण सिर्फ नदियों को ही नष्ट नहीं कर रहा बल्कि इनके किनारे बसे शहरों के भूजल को भी बुरी तरह गंदा कर चुका है. दिल्ली, नोएडा या आगरा में भूजल के खारा या प्रदूषित होने की सबसे बड़ी वजह, इन शहरों में नदी का सूख जाना और उसकी घाटी में सीवर का बहना है. बरसात को छोड़ बाकी दिनों में नदियों में पानी का स्तर भूजल स्तर से नीचा होता है और भूजल नदी में रिसता रहता है. लेकिन नदियों के नष्ट होने के बाद इन शहरों ने भूजल का जबरदस्त दोहन किया और भूजल स्तर नदी के जल स्तर से नीचे चला गया. नतीजारू जो भूजल रिसकर नदी में जाना चाहिए था, वह नदी से उसी की ओर आने लगा.
चूंकि नदियां पूरी तरह प्रदूषित हो चुकी थीं, इसलिए उनकेपानी ने भूजल को भी नहीं बख्शा. तभी तो डॉ. तारे तल्खी भरे शब्दों में कहते हैं, ‘‘हमने नदियों के साथ ही पूरी सभ्यता को मारने की तैयारी कर ली है.’’ जिस तरह यमुना से निकलने वाली अमोनिया गैस त्वचा की बीमारियों को बढ़ावा दे रही है और हाइड्रोजन सल्फाइड गैस भीषण भभका छोड़ रही है, उससे यह बात खुद ही साबित हो जाती है.
इस बीच, नष्ट की जा रही नदियों के बरक्स कुछ लोग इन्हें बचाने को बेचौन हैं. दो साल पहले एक संस्था बनी ‘आइआइटियंस फॉर हॉली गंगा.’ इसमें देश की विभिन्न आइआइटी से निकले और आज प्रतिष्ठित जगहों पर काम कर रहे विशेषज्ञ शामिल थे. उन्होंने नारा दिया: सबके लिए साफ पानी. संस्था के अध्यक्ष यतींद्र पाल सूरी कहते हैं, ‘‘आप पूरे इको-सिस्टम को समझे बिना इस तरह नदियों को नहीं बांध सकते. अविरल गंगा सिर्फ नारा नहीं है, हमारे वक्त की जरूरत है.’’
आर्सेनिक का जहर
इसी जरूरत को बारीकी से समझने के लिए ऋषिकेश के 36 वर्षीय आचार्य नीरज ने 2010 में गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा की पैदल यात्रा की. ऑर्गेनिक केमिस्ट्री में एमएससी करने के बाद धार्मिक कार्य से जुड़े. आचार्य का यह तजुर्बा गौर करने लायक था. इस लंबी यात्रा में लगातार गंगा या उसके पास के हैंडपपों का पानी पीते रहने से उनके शरीर में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ गई.
अपनी उम्र से कहीं बड़े नजर आने वाले आचार्य कहते हैं, ‘‘जमीनी स्तर पर प्रदूषण साफ करने के उपाय कभी लागू हुए ही नहीं. गंगा एक्शन प्लान की नाकामी की यह एक बड़ी वजह रही.’’ आर्सेनिक नाम बेहद जहरीला रासायनिक तत्व गंगा की घाटी के भूजल को किस कदर प्रदूषित कर चुका है, इसका खुलासा जाधवपुर युनिवर्सिटी के प्रो. दीपंकर चक्रवर्ती के 15 साल से चल रहे शोध में लगातार हो रहा है. वह पटना, बलिया, बनारस, इलाहाबाद, कानपुर तक बढ़े हुए आर्सेनिक की पुष्टि कर चुके हैं. ताज्जुब नहीं होगा अगर जल्द ही दिल्ली के पास गढ़ मुक्तेश्वर तक आर्सेनिक की पुष्टि के प्रमाण मिल जाएं.
इन्हीं विसंगतियों पर जब 11 मार्च को राज्यसभा में चर्चा हुई तो वन और पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने माना, ‘‘मैं यह दावा नहीं कर रही कि गंगा एक्शन प्लान के एक-एक पैसे का सही इस्तेमाल हुआ. लेकिन अगर ये प्लान न बने होते तो स्थिति और बुरी हो चुकी होती.’’ मंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि देश के ज्यादातर ट्रीटमेंट प्लांट म्युजियम की तरह खड़े हैं, वे कभी अपना काम कर ही नहीं पाए. समाजवादी पार्टी के सांसद मुनव्वर सलीम ने भी अपनी चिंता जोड़ी कि नदियों को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया जाना चाहिए.
छब्बीस साल से इस दिशा में जो खानापूरी हुई है, उसके चलते अब गंगा-यमुना को बचाने के लिए भागीरथ-से प्रयास और कुबेर के खजाने की जरूरत पडऩे वाली है. पर्यावरण मंत्रालय को भेजी गई आइआइटी कानपुर की रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ दिल्ली में यमुना को साफ करने के लिए 15 साल तक हर साल कम-से-कम 1,217 करोड़ रु. की दरकार है. इसी आंकड़े को आधार मानें तो गंगा-यमुना को पूरी तरह से साफ करने के लिए कम-से-कम एक लाख करोड़ रु. की जरूरत पड़ेगी.
तारे को भरोसा है कि इस साल दिसंबर के अंत तक विशेषज्ञ दल जब रिपोर्ट सौंपेगा तो उसमें भागीरथ प्रयास और कुबेर के खजाने, दोनों का इंतजाम होगा. तब तक यह सवाल अपनी जगह बना रहेगा, जो 11 मार्च को राज्यसभा में बीजेपी सांसद अनिल माधव दवे ने इस शेर के जरिए पूछा था: तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता के काफिला क्यूं लुटा?
                                                                          ...पीयूष बबेले की रिपोर्ट, इंडिया टुडे, 3 अप्रैल2013
 

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

प्रतिमा विसर्जन से मैला हुआ मां का आंचल


जैसा कि मैने अपनी पिछली पोस्टो मे कहा था कि नवरात्रो के बाद गंगा और मैली हो जायेगी, वही हुआ. आज दैनिक जागरण समाचार से  इस बात की पुष्टि होती है. कानपुर के तमाम घाटो की स्थिति पर आधारित यह खबर देखिये और मूर्तिविसर्जन के प्रदूषणकारी परिणामो से अवगत होइये.
"एक मां की मूर्तियों का विसर्जन कर श्रद्धालुओं ने दूसरी मां के आंचल को मैला कर दिया। शहर के सरसैया घाट, गोला घाट, मैस्कर घाट व अन्य घाटों में दुर्गा प्रतिमाओं के अवशेष, प्लास्टिक की थैलियां बिखरी हुई हैं। गंगा की धारा को स्वच्छ बनाने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं पर गंगा की धारा निर्मल नहीं हो पा रही। इसके पीछे कहीं न कहीं हम सभी जिम्मेदार हैं। आस्था के नाम पर दुर्गा पूजा और गणेश उत्सव के बाद गंगा में मूर्तियां का विसर्जन कर मां को गंदा किया गया वहीं मंदिरों में चढ़ाए गए फूल व अन्य पूजन सामग्रियों को भी प्रवाहित कर मोक्षदायिनी के आंचल को मैला किया जा रहा है। जिन घाटों पर स्नान के लिए भक्तों की सर्वाधिक भीड़ होती है, वही घाट सबसे अधिक गंदे हैं। घाटों में हर जगह मूर्तियों के अवशेष पड़े हुए हैं। गणेश उत्सव के बाद गंगा में छोटी बड़ी करीब पांच हजार मूर्तियां गंगा में विसर्जित की गई थीं। भगवान गणेश के गदा, चक्र आदि स्टील के थे तो घाटों पर रहने वालों ने उन्हें निकाल लिया था। पुआल हटाकर लकडि़यों के ढांचे भी लोग ले गए पर वस्त्र उन्होंने घाटों पर ही छोड़ दिए। कुछ ऐसा ही दुर्गा पूजा के बाद हुआ। पांच सौ से अधिक दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन हुआ जिनके अवशेष घाटों के किनारे पड़े हैं। श्रद्धालुओं ने विसर्जन के समय अन्य पूजन सामग्रियां भी प्लास्टिक थैलियों में भरकर फेंक दी थीं। ये प्लास्टिक की थैलियां व वस्त्र घाटों के किनारे ही पड़े हुए हैं। अभी तक उन्हें उठाने को कोई संस्था आगे नहीं आई है।"

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

केवल 1,706 बाघ बचे हैं

देश में बीते नौ महीनों में कम से कम 69 बाघों की मौत हुई है। इनमें से अधिकांश बाघों की मौत दुर्घटना या फिर शिकारियों के कारण हुई है। यह जानकारी राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने शुक्रवार को दी।यह सूचना IBN7 से प्राप्त हुयी है।
एनटीसीए के सहायक महानिरीक्षक राजीव शर्मा ने बताया कि देश के 41 बाघ अभयारण्यों में जनवरी से सितम्बर के बीच 69 बाघों की मौत हुई है। इनमें से 41 की मौत शिकार या फिर किसी दुर्घटना के कारण हुई है, जबकि 28 की प्राकृतिक मौत हुई है।
उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में मृत्यु दर ऊंची है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश में केवल 1,706 बाघ बचे हैं।
 जैसा कि पहले भी मै कह चुका हू  बाघों को सुनियोजित तरीके से नरभक्षी बनाया जाता है फिर उनकी हत्या को वैध रूप प्रदान करने में आसानी हो जाती है. यह सब उस मानवता के नाम पर होता है जो चाँद कागज के टुकडो में बिकती है. बाघों का शिकार बढ़ती मांग का ही नतीजा है .  6 साल पहले बाघ की हड्डियां प्रति किलो 3,000 से 5,000 डॉलर हुआ करती थी। बाघ की हड्डियों का इस्तेमाल कामोत्तेजना बढ़ाने वाले उत्पाद, जोड़ों या हड्डियों की बीमारियों को दूर करने की दवाएं आदि बनाने में किया जाता है। वहीं बाघ के नाखून बुरी शक्तियों को दूर भगाने के लिए लोकप्रिय हैं। इनकी कीमत भी हड्डियों के बराबर ही है। तब से लेकर अब तक इनकी कीमतें 10 से 15 फीसदी बढ़ी हैं।
अरबो  रूपये खर्च होने के बाद  भी बाघों का संरक्षण   चुनौती बना हुआ है।

गुरुवार, 28 जून 2012

गंगा का विकल्प नहीं है



मोक्ष दायनी, जीवन दायनी, पतित पावनी माँ गंगा, हमारे जीवन का आधार माँ गंगा, हमारा पालन पोषण करने वाली माँ गंगा, हमारे पापों को हरने वाली माँ गंगा, हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक साथ देने वाली माँ गंगा/ आज माँ गंगा को हमने खुद मृत्यु के नजदीक ला के खड़ा कर दिया है/ इस के लिए हम किसी दुसरे को दोष नहीं दे सकते है, आज गंगा को इस स्तिथी में लाने वाले हम ही हैं/ हमारा अधिकाधिक बढता उपभोग ही इसके लिए जिम्मेदार है/
माँ गंगा नदी उदगम से लेकर अंत तक लगभग ४० करोड़ लोगों के बीच से होकर गुजरती हैं/ इस मार्ग १०० से भी ज्यादा बड़े शहर एवं लाखों छोटे नगर, कस्बे, गाँव आदि पड़ते हैं/ देश की ४५% जनसँख्या गंगा छेत्र में रहती है, देश का ४७% सिंचित छेत्र गंगा बेसिन में है/ पेयजल, सिंचाई का पानी और आस्था स्नान में गंगा की अपरिहार्यता है, लेकिन यही गंगा तमाम बाधों, तटवर्ती नगरों के सीवेज और औद्योगिक कचरे को ढोने के कारण मरणासन्न है/
आज माँ गंगा जहाँ से निकल रही है वही से प्रदूषित होकर निकल रही है, माँ गंगा के उदगम स्थल पर आज ३०० से अधिक बाँध योजनायें प्रस्तावित हैं/ माँ गंगा को इन बांधों के माध्यम से कैद किया जा रहा है/ 'माँ गंगा तेरा पानी अमृत कल कल बहता जाये' यह बाते अब सिर्फ गीतों तक ही रह जायेंगी/ श्रीनगर क़स्बा, गढ़वाल के पास बनने वाले बांधो की वजह से की वजह से माँ गंगा का प्रवाह अब ५० किलोमीटर तक सुरंग के अन्दर ही रहेगा अब उदगम पे ही माँ गंगा दर्शन के उपलब्ध नहीं हो पाएंगी/ चायगाँव जोशी मठ के पास भी गंगा नदी अब ११ किलोमीटर तक सुरंग के अन्दर ही रहेगी/ अब वहां के निवासियों को अस्थियाँ प्रवाहित करने के लिए भी माँ गंगा नहीं मिलेंगी/ जहाँ गंगा नदी कल कल छल छल बहती थी अब वहां ऐसा लगता है जैसे आप किसी नदी की लाश पे से गुजर रहे हो/ वहां माँ गंगा अब मर चुकी हैं/
देवप्रयाग के पास जहां अलकनंदा और भागीरथी नदियों का संगम होता है वहां बाँध बनाने के लिए १२०० हेक्टेयर का जंगल साफ़ कर दिया गया है, वहां रहने वाले जंगली जानवरों का घर अब उजाड़ दिया गया है किसी को उनकी कोई चिंता नहीं है/ नदियों को सुरंग से ले जाने के कारण उनमे रहने वाले ऊदबिलाव और महर्षि मछलियां शायद अब इतिहास की बात हो जाएँ/
विकास हो रहा है लेकिन शायद एक नदी की लाश पर जिसे हम अपनी माँ कहते हैं/ हमे बिजली चाहिए लेकिन उन जंगली जानवरों के घर उजाड़ कर या उनका अस्तित्व खत्म कर के/ कल यही विकास हमारी और आपकी लाश के उपर से होगा क्यों की ना तो पीने के लिए पानी होगा ना ही सिचाई के लिए/ विद्युत का विकल्प है लेकिन माँ गंगा का विकल्प नहीं है/(आदित्य पालीवाल)