'हरी धरती' उत्तर आधुनिकता के पश्चात उस आन्दोलन की शुरुआत है जिसका लक्ष्य "संरक्षणात्मक विकास" है. जटिलता की जगह सरलता कुटिलता की जगह साधुता कृत्रिमता की जगह प्राकृतिक तथा लौहपिजरे से मुक्ति के प्रति प्रतिबद्ध. जल जंगल जमीन व जानवरों के संरक्षण हेतु ऐसा अभियान जो दमन की परवाह किये बिना अपने अंजाम तक पहुचने के लिए कटिबद्ध है.
गुरुवार, 28 जून 2012
गुरुवार, 10 मई 2012
गंगा को बचाने के लिये आत्मबलिदानी जत्था तैयार
गंगा को प्रदूषण और बान्धो की विभीषिका से बचाने के लिये फिर से आमरण अनशन पर बैठे डॉ. जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद की हालत नाजुक बनी
हुई है। वह दिल्ली के एम्स में भर्ती हैं।डा अग्रवाल ने पानी तक त्याग दिया
है। यदि गंगा बचाने की इस मुहिम में डा अग्रवाल ने अपने प्राण त्याग दिए तो यह
आंदोलन और बढ़ जाएगा।
डा अग्रवाल के साथी व हाल ही में नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी से इस्तीफा देने वाले मैग्सेसे अवॉर्ड विजेता राजेंद्र सिंह के मुताबिक, जिस दिन अग्रवाल प्राण त्यागेंगे उसी दिन गंगा प्रिय भिक्षु जी की मुहिम शुरू हो जाएगी। सिंह ने कहा कि गंगा मुक्ति के इस अभियान में पांच लोग अपने प्राणों की आहुति देने के तैयार हैं।
ये है जत्था
इस जत्थे में गंगा प्रिय भिक्षु जी और राजेंद्र सिंह के अलावा स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद व कृष्ण प्रियनंद ब्रrाचारी भी अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार हैं। पहले अन्न त्याग, फिर फल और अंत में जल त्याग। सिंह ने बताया कि हम पांच लोगों ने 24 जनवरी को गंगासागर में गंगा की रक्षा के लिए यह संकल्प लिया था।
ये हैं तीन मांगें
1. गंगा पर बन रही जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगे।
2. गंगा में गिरने वाले गंदा पानी रोकने के लिए मैनेजमेंट प्लान 2020 की घोषणा हो
3. गंगा नीति बनाई जाए।
डा अग्रवाल के साथी व हाल ही में नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी से इस्तीफा देने वाले मैग्सेसे अवॉर्ड विजेता राजेंद्र सिंह के मुताबिक, जिस दिन अग्रवाल प्राण त्यागेंगे उसी दिन गंगा प्रिय भिक्षु जी की मुहिम शुरू हो जाएगी। सिंह ने कहा कि गंगा मुक्ति के इस अभियान में पांच लोग अपने प्राणों की आहुति देने के तैयार हैं।
ये है जत्था
इस जत्थे में गंगा प्रिय भिक्षु जी और राजेंद्र सिंह के अलावा स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद व कृष्ण प्रियनंद ब्रrाचारी भी अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार हैं। पहले अन्न त्याग, फिर फल और अंत में जल त्याग। सिंह ने बताया कि हम पांच लोगों ने 24 जनवरी को गंगासागर में गंगा की रक्षा के लिए यह संकल्प लिया था।
ये हैं तीन मांगें
1. गंगा पर बन रही जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगे।
2. गंगा में गिरने वाले गंदा पानी रोकने के लिए मैनेजमेंट प्लान 2020 की घोषणा हो
3. गंगा नीति बनाई जाए।
लेबल:
आत्मबलिदानी जत्था,
जी डी अग्रवाल
मंगलवार, 27 मार्च 2012
गंगा या दुर्गा को माँ कहना बन्द करो नौटंकीबाजो
इस समय नवरात्रे चल रहे है जगह जगह मन्दिर मन्दिर देवी के पन्डाल सजाये गये है जगराते हो रहे है, देवी जी को प्रसन्न करने के तमाम उपाय प्रयास जोर शोर से किये जा रहे है. इस मौसम मे तमाम औरते ऐसी आराम से दिख जाती है जिन पर देवी जी की सवारी भी आती है. लोग बाग नवो दिन के व्रत कर रहे है. मै यह देख कर हैरान रह जाता हू कि मुहल्ले की जो सबसे कुटनी औरत होगी उसके ऊपर देवी जरूर आयेगी. जिस आदमी की जुबान मा बहनो की गाली से सनी होगी वह जै माता दी जोर से बोल् रहा होगा. जितने उठायीगीर और छुटभैये लोग है वो सब मुह मे मसाला दबाये जगराते हेतु चन्दा वसूली कर रहे होगे. कोढ मे खाज यह कि सारी प्लास्टर आफ पेरिस की मूर्तियो को गंगा मे विसर्जित कर गंगा जल को और जहरीला कर ये लोग गंगा मा और दुर्गा मा को प्रसन्न करते है. प्रत्येक साल सैकड़ों प्रतिमाओं के विसर्जन के बाद उससे निकले केमिकलयुक्त रंग, प्लास्टिक आदि से गंगा प्रदूषित होती जा रही है. इसे पर्यावरण को तो नुकसान हो ही रहा है, गंगा में रहने वाले जीवों के अस्तित्व भी खतरे का बादल मंडराने लगा है.मूर्तियों को बनाने में कई रंगों के अलावा फेवीकॉल, माजा खल्ली, इमली पाउडर, गोंद, चमक के लिए वारनिस आदि का इस्तेमाल किया जाता है. मूर्तियों के बाल सन के बनाये जाते हैं. बाद में उसे रंग से काला किया जाता है. मूर्ति विसर्जन से गंगा में कई हानिकारक केमिकल मिल जाता है. इससे जलीय जीवों के साथ-साथ पर्यावरण को भी नुकसान होता है. केमिकल युक्त पानी पीने से मछलियों में में कई तरह की बीमारियां पैदा होती है. इसे खाने से मनुष्य के स्वास्थ्य को भी नुकसान होता है. प्लास्टिक खाने से मछलियों के गले में चोक हो जाता है और वह मर जाती हैं. अब सवाल यह उठता है कि बात बात मे मा के नाम पर गाली देने वाले लोग देवी दुर्गा को मा कहने के अधिकारी है, गंगा मैया के अस्तित्व को समाप्त करने मे कोई कोर कसर न रखने वाले किस मुह से मा गंगा कह सकते है?
लेबल:
आडम्बर्
शनिवार, 25 फ़रवरी 2012
कानपुर मे गंगा की दुर्दशा, 2500 करोड का खेल: प्रोफेसर विनोद तारे
कानपुर मे गंगा की धारा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए 2500 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं फिर भी
नतीजा सिफर है। पतित पावनी आज भी मैली हैं। कानपुर में गंगा का सबसे बुरा हाल है।
यहां 400 करोड़ रुपए से ज्यादा का बजट खर्च हो चुका है
फिर भी रोजाना गंगा में गिरने वाले 544.69 एमएलडी सीवरेज कचरे के शोधन की व्यवस्था नहीं है। टेनरी वेस्ट
और शहर की गंदगी गंगा में बहाई जा रही है। इसकी सुध नगर निगम और प्रदूषण बोर्ड
नहीं ले रहा है। आईआईटी के प्रोफेसर और नेशनल गंगा रिवर बेसिन अर्थारिटी के
समन्वयक के अनुसार गंगा एक्शन प्लान-1 और 2
में 2500 करोड़ रुपए का बजट जारी किया गया था। यह बजट
ट्रीटमेंट प्लांट बनाने, चलाने, सफाई और जागरूकता अभियान में खत्म हुआ है फिर
भी नतीजा शून्य रहा। गंगा मैली की मैली हैं।
7000 करोड़ का प्रावधान
गंगा एक्शन प्लान के तहत 1985-2010 के बीच 1000 करोड़ रुपए खर्च हो गए हैं। 1500 करोड़ रुपए की दूसरी किश्त भी जारी हो चुकी है। संबंधित राज्यों
का बजट आवंटित कर दिया गया है। यह बजट भी ट्रीटमेंट प्लांट पर खर्च किया जा रहा
है। इससे बेहतर नतीजे मिलने की उम्मीद नहीं है। विश्व बैंक, केन्द्र सरकार ने गंगा के लिए 7000 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान किया है। जिसे
अगले 10 साल में खर्च किया जाना है।
कन्नौज - वाराणसी के बीच सबसे ज्यादा गंदगी
- कानपुर में 20 नालों के माध्यम
से रोजाना 544.69
एमएलडी सीवरेज कचरा
गंगा में गिर रहा है। 544.7 एमएलडी वेस्ट वाटर भी गंगा में जा रहा है। कन्नौज से वाराणसी के बीच लगभग 450 किलोमीटर तक गंगा सबसे ज्यादा प्रदूषित है।
यहां से 75 फीसदी म्यूनिसिपल सीवेज और 25 फीसदी औद्योगिक कचरा गंगा में गिरा रहा है।
रोज 544.69 एमएलडी कचरे का शोधन नहीं
- जाजमऊ में तीन ट्रीटमेंट प्लान बने हुए हैं। पांच एमएलडी के ट्रीटमेंट
प्लांट में चार एमएलडी, 130 एमएलडी के प्लांट में 60 एमएलडी और 36 एमएलडी के प्लांट में 22-26 एमएलडी कचरा जा रहा है, जो मानक से कम है। तीनों ट्रीटमेंट प्लांट को
बनाने में 55
करोड़ रुपए खर्च हुए
हैं। संचालन में करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं। फिर भी रोजना निकलने वाले 544.69 एमएलडी कचरे का शोधन नहीं हो पा रहा। रोजना 90 एमएलडी कचरा ही शोधित किया जा रहा है।
फिर करोड़ों का बजट बहाने की तैयारी
- जाजमऊ में 43 एमएलडी, बिनगवां में 210 एमएलडी, बनियापुरवा में 15 एमएलडी और सजारी, सनिगवां में 42 एमएलडी का सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाया जा रहा है, जिसे आईआईटी के वैज्ञानिकों ने बंद करने की
सलाह दी है। उनका कहना है कि पहले प्लांट चलाने, रखरखाव के लिए बजट की व्यवस्था कर ली जाए फिर प्लांट बनाया जाए।
नहीं तो करोड़ों रुपए का बजट
बेकार जाएगा। भविष्य में पांडु नदी पर 126 एमएलडी, बिनगवां में 115
एमएलडी
का ट्रीटमेंट प्लांट बनाया जाना है। यह भी बजट बहाने का तरीका है।
सहायक नदियां सूखीं, कचरा जमा
- महुआ , काली , रिंद और पांडु नदी सूख गई हैं। इससे गंगा का
बहाव कम हो गया है। कचरा जमा हो रहा है। पानी में कीड़े पड़ने लगे हैं। इससे
हरिद्वार और कुंभ में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को दिक्कत होती है। गंगा में
गिरने वाली घाघरा, राप्ती, कोसी, गंडक, गोमती और यमुना
नदी का बहाव भी कम हो गया है।
गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने का माडल बनाया
जा रहा है, जिसे अगले दो
साल में पर्यावरण मंत्रालय को सौंपा जाएगा। पहले माडल में ट्रीटमेंट का संचालन
पीपीपी माडल पर करने का सुझाव दिया गया है। यूपी के कानपुर सहित 11 राज्य के 200 शहरों में लगे ट्रीटमेंट प्लांट ठीक से काम नहीं कर
रहे हैं। सीवरेज, टेनरी, पेपर मील, डिस्टेलरी, चीनी मिलों का
कचरा सीधे गंगा में जा रहा है,
जो
खतरनाक है। गंगा में मिलने वाली काली नदी और रामगंगा भी प्रदूषण की बड़ी वजह है।
इनके पानी के शोधन की व्यवस्था करनी होगी।
.....साभार अमर उजाला
बुधवार, 30 नवंबर 2011
लवकुश आश्रम मे एक दिन.
पिछले रविवार को मै और डॉ पंकज सिंह(हम दोनों एक ही जगह पढ़ाते है) जीवन विद्या से जुड़े संतोष सिंह भदौरिया जी द्वारा स्थापित लवकुश आश्रम का अवलोकन करने गए थे. यहाँ प्राकृतिक खेती पशुपालन व मानव मूल्यों की शिक्षा दी जाती है. बैल चालित मशीन से चारा कतरने पानी निकालने व आटाचक्की चलाने का काम होता है. भदौरिया जी मध्यस्थ दर्शन के प्रवर्तक श्री ए नागराज (अमरकंटक) जी के शिष्य है. नागराज जी का मानना है की इस समय " आदमी को मशीन जैसा बनाया जा रहा है और मशीन को आदमी जैसा." मानव की आत्मनिर्भरता उसके सम्बन्ध पूर्वक जीने में होती है. जब मानव सभी प्राणियों के साथ सह अस्तित्व को स्वीकार कर लेता है और सह अस्तित्व में जीना सीख लेगा है तो वह सुखी हो जाएगा.
लेबल:
Lavkush ashram
मंगलवार, 13 सितंबर 2011
सई नदी मृत नदी क्यो? जंगल माफियाओ का कारनामा
सई नदी को मृत नदी के रूप मे तब्दील किया जा चुका है. यह तब्दीली और कही से नही आयी बल्कि वही के लोगो की वजह से आयी है. मै लगभग ढाई महीने पहले जब नदी के किनारे गया था तो वहा नाम मात्र का पानी था. आस पास के लोगो से बात चीत के आधार पर ज्ञात हुआ कि बरसात के दिनो मे सई का पानी किनारे बसे गावो मे भर जाता है. सई नदी को ध्यान से देखने के बाद मुझे पता चलाकि यह नदी छिछली होती जा रही है. नदी के पुल के इस पार धीरदास धाम है जहा एक बाबा की समाधि बनी हुयी है. उस पार चुंगी है. हालांकि अब बन्द हो गयी है. चुंगी के नीचे की हलचल देखकर मै वहा देखा तो माजरा समझ मे आया. यहा जंगल माफियाओ क स्वर्ग दिखा मुझे. नदी के किनारे पेडो की कटान अपने चरम पर थी. मैने कैमरा निकाल कर कुछ स्नैप्स लिये. यह देखकर एक मोटा आदमी आकर धमकाने लगा. जल्दी जल्दी कैमरा जेब मे ठूस कर वहा से निकला. धीर दास की ओर जाते हुये मैने सोचा कि इतने सई नदी और बाबा के भक्त लोग यहा है बावजूद इसके इन गुंडो और अपराधिये की रोक टोक करने वाला कोई नही है.
पेड कटने से मिट्टी स्वतंत्र हो जाती है (जिसको जडे बाधे रहती थी) और नदी मे सीधे पहुचती है फिर नदी की तलहटी मे जमा होती रहती है. जिससे नदी उथली होने लगती है. यही चीज बाद मे नदी के सूखने और बाढ का कारण बनती है.इसी वजह से जीव जंतु और अन्य वनस्पतिया भी विकसित नही हो पाते और नतीजा नदी मृत्यु की ओर बढने लगती है.
लेबल:
सई नदी
शुक्रवार, 9 सितंबर 2011
वास्तविक हरित क्रांति का पहला चरण: बैल चालित पम्प
भारत में तकनीकी विकास इतना हो गया हम चाँद और मंगल पर बेस बनाने की तैयारी में लगे है. किन्तु आज भी लगभग ३० परसेंट जनता दो वक्त की रोटी का इंतजाम बमुश्किल कर पाती है तो ऐसे में तकनीकी विकास की सार्थकता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगता है.
तकनीकी विकास मतलब उपग्रह छोड़ना संकर प्रजाति के बीज बनाना सूचना आदान प्रदान की सहूलियतो को तीव्र करने इत्यादि से लगाया जाता है.जबकि विकास पैमाना यह होना चाहिए कि शोषण से कितनी मुक्ति मिली और प्रक्रति से कितना तादात्म्य स्थापित हुआ.
उपर्युक्त सिद्धांत को अमलीजामा पहनाते हुए कानपुर के वैज्ञानिको और किसानो के मिलेजुले प्रयासों से एक बैल चालित पम्प का विकास किया गया है. बैलो के प्रयोग से एक तरफ जहा डीजल की बहुमूल्य बचत करके कृषि कार्य को आत्म निर्भता की ओर ले जाया जा सकता है वही ट्रैक्ट्रर के इस्तेमाल करने वाली भारी भरकम लागत से भी निजात पाया जा सकता है.
इस पम्प की विस्तृत जानकारी इस विडियो के माध्यम से दी गयी है.
इस यंत्र की कीमत बोरिंग समेत लगभग 58 हजार रूपये है. सरकार से इस पर सब्सिडी देने क अनुरोध किया गया है किंतु अभी तक कोइ संतोषजनक जवाब नही मिला है.
इस प्रकार यह स्वदेशी तकनीक है जिसके सहारे हम वास्तव मे हरित क्रांति की ओर सतत रूप से बढ सकते है.
नोट: इस यंत्र का प्रयोग कानपुर मे करौली और परियर नामक स्थान पर सफलतापूर्वक किसानो द्वारा किया जा रहा है. यदि किसी को यह अप्प्लीकेशन देखना हो तो वह यहा आकर देख सकता है.
लेबल:
बैल चलित पम्प,
हरित क्रांति
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
