गुरुवार, 27 जनवरी 2011

गंगा तिल-तिल कर मर रही है

गंगा का पानी अब अपने प्रदूषण के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। गंगा सफाई से जुड़े प्रो. वीर भद्र मिश्र की के अनुसार  तो  गंगा में फिकल क्वालिफार्म की संख्या वर्तमान समय में प्रति 100 सी सी पानी में 60 हजार बैक्टीरिया है और वी.ओ.डी की मात्रा चार पांच मिली ग्राम प्रति लीटर है, जबकि यह तीन से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
 वाराणसी में आदि केशव घाट पर यही फिकल क्वालिफार्म डेढ़ लाख प्रति सौ सीसी पानी में हैं, जबकि वी.ओ.डी की मात्रा 22 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में है। अगर एक लाइन में कहा जाय तो गंगा अब मरने के कगार पर पहुंच चुकी है। वह दिन दूर नहीं जब गंगा इतिहास के पन्नों में सरस्वती नदी की तरह कहीं खो जाएंगी।

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में गंगा प्रयोगशाला के हेड प्रो. यू.सी चौधरी ने तो यहां तक कह दिया है कि गंगा में आक्सीजन की मात्रा अब तक के निम्नतर स्तर पर है, क्योंकि टिहरी में गंगा के पानी को रोक तो दिया गया है लेकिन गंदे नालों का पानी गंगा में लगातार गिर रहा है जिससे आक्सीजन की मात्रा लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने बेबाक लहजों में कहा की यदि अब गंगा को बचाने का ठोस प्रयास नहीं किया गया तो गंगा को कोई नहीं बचा
 सकता है।

द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद का कहना है कि 'नदी बेगे न शुद्धते', अर्थात जिस नदी में धारा नहीं होगी उसकी गुणवत्ता भी समाप्त हो जाएगी। रक्षत गंगाम आन्दोलन के प्रणेता राम शंकर सिंह का कहना है कि टिहरी से गंगा को मुक्त कर दिया जाए और शहरों के गंदे नाले गिरने बंद हो जाएं तभी गंगा बच सकती है वरना इसे बचाना संभव नहीं है।

एक नज़र इधर

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गंगा प्रदूषण रोकने के लिए एक विशाल मलशोधन संयंत्र लगाने, घाटों के नवीकरण और अन्य उपायों के संबंध में 497 करोड़ रुपये की एक महत्वाकांक्षी योजना को आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमिटी ने मंजूरी दी।
अब इन रूपयों की गंगा सरकारी बाबुओ हाकिमो नेताओ के घर में बहेगी और वह से और प्रदूषित होकर फिर भागीरथी में मिल जायेगी.
भारत की जीवन रेखा कही जाने वाली गंगा तिल-तिल कर मर रही है लेकिन उसके तथाकथित पुत्र उसे चुप-चाप मरते हुए देख रहे हैं और गंगा कि दुर्दशा ऐसी तब है जब गंगा एक्शन प्लान का दूसरा चरण चल रहा है। कहना न होगा कि गंगा सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये अब तक बहाए जा चुके हैं लेकिन वही हालत है कि 'ज्यों-ज्यों दावा की त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता गया'। गंगा सफाई के सरकारी प्रयास के अलावा कम से कम तीन दर्जन एनजीओ वाराणसी में ऐसे हैं, जो दसों साल से गंगा प्रदूषण का राग अलाप रहे हैं लेकिन गंगा में प्रदूषण रोकने के लिए प्रयास नहीं किए।

9 टिप्‍पणियां:

  1. अँखें खोल देने वाला आलेख मगर नेताओं के कान पर जूँ नही रेंगती। धन्यवाद।

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  2. bahut hi achchi prastuti hai wo bhi aankdon ke saath ise padh kar pata chalta hai ki wakai 'सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए'bilkul dil se likhi hai aapne yah baat.Umeed karti hun ki yah prayash safal ho

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  3. बैठे बठे कब तक काम चलेगा
    आगे कौन कदम बढ़ाएगा?
    कब तक इस तरह हम तिल तिल कर मरते देस समाज गंगा को देखते रहेगे
    आपसे उम्मीद है लेकिन ये सैद्धांतिक वर्क कब तक आप करेगे?
    आप दो कदम आगे बढाए सौ कदम आपके समर्थन में पीछ होगे
    ...............इसी इंतज़ार में

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  4. "अब इन रूपयों की गंगा सरकारी बाबुओ हाकिमो नेताओ के घर में बहेगी और वह से और प्रदूषित होकर फिर भागीरथी में मिल जायेगी"

    एकदम सही वर्णन है।
    मैं मेनका गांधी की पशु कल्याण संस्था पीएफ़ए से जुड़ा हुआ हूँ और ये बात जानता हूँ की बदलाव लाना कितना कठिन है।

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  5. baat bahut sateek kahi aapane . magar reall platform par kch kane k ab sochn chahiy. kuch plan kariy . so that we could relly do some for Ganaga

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  6. बढ़िया लेख लिखा है आपने ...! शायद कुछ जागरूकता बढे अगर कोई ध्यान से पढ़े ! दुखद स्थिति है ....
    शुभकामनायें और अच्छे लेख के लिए आभार !

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  7. यह हाल हिन्दुस्तान कि अन्य नदियों का भी है. गंगा , जमुना, गोमती सभी का यही हाल है.

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  8. यह पोस्ट डेली न्यूज़ ऐक्तिविटिस्ट में छपी है पृष्ठ आठ पर देखे २९ ०१ २०११
    http://blogsinmedia.com/2011/01/

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