शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

इस चोरी में आपकी कितनी सहभागिता है?

धरती व्यक्ति की आवश्यकताओ की पूर्ति कर सकती है, लालच की नहीं. 
                                                                                        महात्मा गांधी
 पर्यावरण के क्षरण का मूलभूत कारण यही लालच है.
हम जितना अपनी आवश्यकता से बाहर का उपभोग करते है कही न कही वह दूसरे का हिस्सा होता है. एक तरह से यह चोरी है. आप बताइए इस चोरी में आपकी कितनी सहभागिता है?
विचार करे.......

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बहुत ही गहरी बात कही है. आवश्यकता से अधिक किसी भी छेज़ का उपयोग दूसरे हा हक मारना ही है....

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  2. मासूम भाई शुक्रिया
    एक पैगाम हरीतिमा के नाम देने के लिए

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  3. ईमानदारी से बोले
    "हम सब चोर है"
    शर्म की बात है
    चोरी आसानी से नहीं छूटेगी
    पर आपसे वादा है कि
    अपनी जरूरत की चीजे ही उपभोग करेगे
    किसी का हक नहीं

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  4. वैसे तो आवश्कताओं की सबकी अपनी अपनी परिभाषा है ।
    धरती पर जनसंख्या का भार बढा कर हम जन्म से ही उसके अपराधी बन जाते हैं ।
    क्या आज हमारी धरती इसके लिये हमे माफ करेगी ।
    क्या हम कभी इस बात पर विचार करते है कि .........

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  5. सही बात है. मनुष्य के लालच ने ही पर्यावरण की दुर्गति की है.

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