रविवार, 12 अप्रैल 2015

गाँव का ज़िंदा रहना आपके ज़िंदा होने का सबूत है।

हर एक व्यक्ति के अन्दर एक गाँव होता है । गाँव कोई स्थान विशेष संज्ञा न होकर एक गुणवाचक शब्द है, जिसके अर्थ विस्तृतता में निहित हैं।.गाँव की मर्यादा क्षितिज के सरीखे होती है, जितने उसके  पास आओ उतना ही उसका विस्तार होता जाता है और इस विस्तृतता में रस है, शहद के गंध में भीगी हवायें हैं,जल से भरे बादल हैं, ऊर्जा  से भरी धूप है, उमंगयुक्त गीत है,नेह है,सम्बंध है,संरक्षण है और जीवन है।

सारा गाँव, सारे खेत कियारी, सारे बाग़, सारे ताल, घर, दुआरगोरू, बछरू, चकरोट, कोलिया, पुलिया, सड़क, सेंवार, बबुराही, बँसवारी, परती, नहरा, नालीबरहानार, मोट, लिजुरी, बरारी, इनारा, खटिया, मचिया, लाठी, डंडा, उपरी, कंडा और बचपन जिसे छोड़कर हम शहर चले आए कि बड़ा आदमी बन जायेंगे, बड़ा आदमी बने कि नही बने ये तो नही पता लेकिन  किरायेदार जरुर बन गये । शहर के किरायेदार । रहने खाने का किराया, पानी का किराया, टट्टी-पेशाब का किराया, सडक पर चलने का किराया, किराए के कपड़े, किराए के ओहदे, किराए के रिश्ते, किराये का हँसना, रोना, गाना, बजाना  और  किराये की जिन्दगी।

किरायेदारी के अनुबंध की शर्ते हमेशा  मालिक और गुलाम का निर्माण करती हैं चाहे रूप और नाम कुछ भी हों पर प्रकृति घोर सामंती  ही है। गाँव से निकली गंगा शहरी सीवर में कब बदल जाती है और सीवर पर किराया कब लग जाता है इस पर शोध करने लायक मेरे पास किराया नही है। फिर भी जिन चीजों से अब तक रूबरू हुआ, महसूस किया, जाना समझा उसके आधार पर एक ही निष्कर्ष पर पहुंचता हूँ कि विरासत को बाज़ार का अजगर निगले जा रहा है। बाज़ार हर किसी को किरायेदार बना देना चाहता है । बाज़ार हर आदमी  में शहर बो रहा  है । शहर  आदमी के अन्दर के गाँव को अपनी कुंडली में लपेट कर उसका दम घोंटने पर उतारू है। यह  प्रक्रिया छुतहे  रोग की तरह फैलता जा रहीऔर सारे  लोगों को शहरातू रोगी बनाने पर तुली  है। बड़े शातिर अंदाज में बाजार और शहर  मिलकर गाँव को समेटने के कुचक्र में लगे हैं। पहले बाजारू लासा लगाओ फिर किरायेदार बनाओ और अंत में शहरातू बना कर गाँव से जड़े काट दो। आदमी सूख जाएगा। फिर बाज़ार उसे जलने के लिए शहर की मंडी में सजा देगा।


समस्या का मूल कारण लासा ही है इसी लासा के चलते सारे कबूतर बहेलिये के जाल में फंस गये थे। इसी लासा के चलते धर्मराज अपनी पत्नी को जुए में हार गये थे यही लासा जाने कितने पतंगों को आग में जला डालती है। यही लासा बाजार है यही बाजार शहर है। लासा खींचती है, समेटती है, मारती है । अगर जीवन को  तुरंत के तुरंत समाप्त  करना है तो लासा लगा लो लेकिन अगर जीवन का विस्तार करना है तो अपने अन्दर के गाँव को टटोलो उसे झाड़ पोंछ कर साफ़ करो, खर पतवारों की निराई कर उसे  गीतों से सींचो  फिर देखो जो फसल लहलहाएगी कि आप बाजारू दरिद्र से दानवीर कर्ण बन जायेंगे गाँव का ज़िंदा रहना आपके ज़िंदा होने का सबूत है। क्या आप ज़िंदा हैं?

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

कहानी गाँव गाँव की (यह कहानी नही शब्दशः सत्य है )

हमारे गाँव में गोलारे मिसिर और दुधई मिसिर दो भाई थे। दोनों के पास गाँव की चार आना जमीन थी । गोलारे के दो पुत्र हुए लाले और लुल्ली। दूधई के खानदान में पुट्टू पुकनू पलटू और कलई हुये। इन लोगों के पास कुल मिलाकर सवा सौ बीघे जमीन होगी । गोलारे और दुधई के मरते ही गाँव के लंबरदारों ने उनके बच्चों को समझाया।इतनी सारी जमीनों का कुछ करो नहीं तो चकबंदी के चक्कर में जमीन सरकार ले लेगी या भूदान आन्दोलन के चलते तुम्हारी जमीनें हरिजनों को दे दी जायेंगी। पुट्टू की अगुवाई में जमीन का सबसे सही उपयोग उसे बेंचना समझा गया सो सबने जमीन बेंचना शुरू किया ।

हमारे बाबूजी कहते थे धरती माँ होती है, अपनी जमीन बेंचना माँ को बेचने जैसा है । सूखी रोटी खा लो, पानी पीकर पेट की आग बुझा लो, मुला जमीन को बेचने की बात राम राम पुरखों को का मुंह दिखाओगे?
पर पुट्टू एंड कंपनी धरती माँ को बेंचते गयी । गाँव के लम्बरदार लोग बैनामा करा करा बरफी चांपते गये । एक दिन ऐसा आया कि जमीन के नाम पर इन लोगों के पास कच्चे घर रह गये। फिर हमने कुछ दिनों बाद देखा घर की मिट्टी का कतरा कतरा बिक गया। फिर भूखे मरते पुट्टू, पुकनू, लाले, लुल्ली, कलई और पलटू लंबरदारों के यहाँ रिक्शा चलाने और छान छप्पर छ्हाने मिट्टी काटने और मौसमी मजदूरी का काम करने लगे।
ठीक यही हाल भुल्लुर के लड़के छंगू का हुआ । मुरली के बच्चों मंगरू और सम्हरू का हुआ। पाठक खानदान का हुआ। बबऊ तेवारी का हुआ। अब हालत ये है कि ये सब इंदिरा गांधी आवास योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों को दी जाने वाली गृह सुविधा के तहत बने बदबूदार कोठरियों में रह रहे हैं ।
अब ये भूमिहीन हैं । सरकार ने तो इनकी जमीने नहीं ली ।
इनकी हालत का जिम्मेदार कौन ? सरकार या ये स्वयं या बरफी खाने वाले लम्बरदार? 

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

गंदगी का निस्तारण समस्या का जड़मूल है।


गंदगी का निस्तारण समस्या का जड़मूल है। बाकी बातें अनुशासनहीनता और बेहूदा आदतों से जुडी हैं। एक बात स्पष्ट कर दूँ कि विलासी वर्ग द्वारा जितनी तीव्रता के साथ गंदगी पैदा की जाती है वह अत्यंत खतरनाक है। गरीबों में बेहूदापन हो सकता सभ्य तौर तरीके के विपरीत आचरण हो सकते हैं किन्तु उनका कचरा ऐसी समस्या नही पैदा करता जिसका समाधान न हो।
साबुन शैम्पू , पाउडर, जेल, परफ्यूम कपडे लत्ते, खान पान, रहन सहन, पैकेट, शौचस्नान, यहां तक कि प्रजननरोधी उपकरणो से जो गंदगी पैदा होती है उसके पुनर्चक्रण या निष्पादन के तरीके आधुनिक विज्ञान खोज नही पाया है। इसके अलावा रासायनिक, आणविक, युद्ध के लिए प्रयुक्त सामग्रियों से उत्पन्न कचरे के निपटान की बात तो अभी चिंता का विषय वस्तु ही नही बना।

एक सवाल पर मंथन करेंगे?

घुरहू(काल्पनिक नाम ) अपने अरहर के खेत में रोज सुबह मल विसर्जित करने जाता है। उसका मल दो चार दिन में अपघटकों द्वारा अपघटित कर मिटटी की उर्वरता में बदल दिया जाता है और परिणामस्वरूप फसल को रासायनिक उर्वरकों से बचा कर देश की मुद्रा बचायी जा सकती है।
......या
मिस्टर आर के वर्मा (काल्पनिक नाम )अपनी इटैलियन संडास में जाकर पानी में मल त्याग करते हैं और ढेर सारे टिस्यू पेपर के साथ वह गन्दगी, गंगा -यमुना में विभिन्न बीमारी पैदा करने वाले रोगाणुओं के साथ मिलती है और पवित्र नदियों को दूषित कर देती है। पानी में मानव मल कभी अपघटित नही होता बल्कि पानी के साथ मिलकर हैजा बन जाता है।
दोनों में कौन गंदगी के लिए जिम्मेदार है ? 

गंदगी एक आधुनिक अवधारणा है जिसकी जड़े औद्यौगिक क्रान्ति और विज्ञानवाद में है।  पत्तों पर पानी देकर कुछ समय के लिए पेड़ को चमकदार देखा जा सकता है पर थोड़े दिन बाद पेड़ का सूखना निश्चित है। रही बात विदेशों में साफ़ सफाई का तो उनके यहाँ कचरे की डंपिंग को लेकर जो बवाल हो रहा है उसको हम नही देख पा रहे या देखना नही चाहते।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

कश्मीर में बाढ़ और विकास

विकास का पैमाना मानव की चेतना, सहनशीलता और सामंजस्य करने की क्षमता पर आधारित है इसके पश्चात कोई भी प्रक्रिया सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है।
कश्मीर में लगभग पचास के आस पास झीलें और तालाबों के ऊपर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए। मुम्बई में मीठी नदी की तरह यहाँ भी पानी के परंपरागत निकासी स्रोत्तों पर अतिक्रमण कर उन्हें समाप्त कर दिया गया।
आज प्राकृतिक वस्तुओं पर जिस तरह से अतिक्रमण कर वहाँ होटल, मॉल  बिल्डिंग बनाकर वह की सुंदरता और वहां की जीवोक्रेसी को ख़त्म किया जा रहा प्रकृति का रिएक्शन उसी का परिणाम है।
इन प्राकृतिक आपदाओं के माध्यम से प्रकृति ने अपनी बात मानव के समक्ष रखी है।प्रकृति को विनम्रता पूर्वक समझना और उसके हिसाब से चलने में ही मानव का अस्तित्व कायम रह पायेगा अन्यथा डायनासौर की गति को प्राप्त करने में देर नहीं होगी।


बुधवार, 16 जुलाई 2014

तालाब खतम, पानी खतम, गाँव कैसे ज़िंदा रहेगा ?

हमारे गाँव को तालाबों का गाँव कहा जाता था। 

सिउपूजन दास कहते थे... 

छंगापुरा एक दीप है बसहि गढ़हिया तीर।  
पानी राखो कहि गए सिउपूजन दास कबीर।।  

हमारे गांव के उत्तर की तरफ  बड़का तारा करीब बीस बीघे में फैला हुआ।  फिर पंडा वाला तारा पूरब में दामोदरा और मिसिर का तारा कोने में तलियवा।  पच्छिम में दुर्बासा तारा, दक्खिन में गुड़ियवा तारा। इसके अलावा हर घर के आस पास फैले खाते और बड़े बड़े गड़हे वाटर हार्वेस्टिंग के जबरदस्त स्रोत पूर्वजों द्वारा  आने वाली पीढ़ियों के लिए बनाये गए थे। बाग़ बगीचों से लदा फंदा और पानी से भरे कुंओ और ठंडी ठंडी हवाओं वाला  हमारा गाँव बारहो महीने खुशहाली के गीत गौनही गाता था। 

समय बदला पैंडोरा बॉक्स खुला। लालच और ईर्ष्या के कीट बॉक्स में से निकल कर हमारे गाँव में शहर वाली सड़क और टीवी के रस्ते घुस गए।  

कल मेरा भतीजा आया था बता रहा था कि चाचा अपना कुंआ अब सूख रहा है।  गाँव में तकरीबन सारे कुंये सूख गए हैं।  लोगों ने अब सबमर्सिबल लगवा लिए है बटन दबाया पानी आ गया।  पंडा वाला तालाब को पाट  दिया गया है  वहा दीवार उठा दी गई है। लल्लू कक्का ने घर के सामने का खाता पाट दिया है। गुड़ियवा और तलियये वाला तालाब खेत में बदल गया है।  बाग़ को काट काट लोग लकड़ियां बेंच पईसा बना रहे।  अब गाँव में हर घर टीवी है रोज बैटरी चार्ज कराने को लेकर झगड़ा मचा रहता है।  बाप खटिया में खांसता रहता है बच्चे मोबाइल में  रिमोट से लहंगा उठाने वाला गाना सुनने में मस्त। गाँव में कंक्रीट के चालनुमा मकान सरकारी आवास योजना से बन कर तैयार हो रहे जिसे ग्राम प्रधान कमीशन लेकर बाँट रहा।  हर घर में अलगौझी।  भाई भाई से छोड़िये बाप अलगौझी अऊर अबकी गाँव में छंगू  की मेहरारू  छंगुआ के जेल भिजवाई के केहु अऊर के साथ जौनपुर भागी है। इज्जत आबरू मान मर्यादा सब खत्म। 
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तालाब खतम 
पानी खतम 
गाँव कैसे ज़िंदा रहेगा ?

सोमवार, 26 मई 2014

शैक्षिक गुणवत्ता, मुनाफा और विदक्षता का दुष्चक्र।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था "विदक्षता" (Deskilling) के दुष्चक्र में फंस गयी है।  शैक्षिक प्रसार के नाम पर पूरी  व्यवस्था  को निजी संस्थाओं के हवाले किया जा रहा है।    ऐसे में शैक्षिक गुणवत्ता का स्थान मुनाफे ने ले लिया है। येन केन प्रकरेण मुनाफा प्राप्त करना ही संस्थाओं का अंतिम उद्देश्य बन चुका है। कोई भी शराब बनाने वाला, मिठाई बनाने वाला,कबाड़ व्यापारी, माफिया, नेता, अपराधी  देश हित या समाज हित को आड़ बनाकर पैसे के जोर से शिक्षाविद बन जाते है और महज पैसा बनाने के लिए स्कूल कॉलेज या यूनिवर्सिटी खोल लेते है। 
 लग्जरियस इंफ्रास्ट्रक्चर, फर्जी आंकड़े, फर्जी सूचनाओं एवं दलालो के सहारे कालाबाजारी कर "इन्टेक" पूरा करते है। इस प्रक्रिया में दूर दराज के छात्रों को बहला फुसलाकर उन्हें सुनहरे सपने दिखा कर उन्हें  संस्थाओं में एजेंट को मोटी  रकम देकर एडमिट किया जाता है . फिर उनकी पढ़ाई लिखाई के लिए अकुशल शिक्षक ( हालांकि कागजी  आंकड़ों में ये संस्थान हाई क्वालिफाइड टीचर्स दिखाते है जो अधिकतर उस संस्थान के निरीक्षण के समय भौमिक सत्यापन हेतु मौजूद रहते है और निश्चित रकम लेते है) रखे जाते है। ये अकुशल शिक्षक या तो " फ्रेशर" होते है अल्प जानकारी रखने वाले या कम वेतन पर काम करने को "विवश" लोग। मजे की बात तो यह है कि निजी संस्थाओं में हाई डिग्री होल्डर के ऊपर हमेशा निकले जाने की तलवार लटकती रहती है क्योंकि संस्थान के मालिक को मनोवैज्ञानिक भय होता है की हाई प्रोफाइल टीचर उसके कंट्रोल में नही आएगा और अधिक वेतन की मांग करेगा। इसलिए ये लोग साक्षात्कार के दौरान ही हाई क्वालिफाइड कैंडिडेट को पहले से बाहर कर देते हैं। इस प्रकार एक अकुशलता का चक्र बनता है।  अकुशल शिक्षक के अध्यापन से जो छात्र तैयार होंगे वो भी गुणवत्ता विहीन होंगे और जब ये क्षेत्र में काम करने जाएंगे चाहे वह उत्पादन हो या सेवा क्षेत्र वहा भी गुणवत्ता मानको से नीचे ही रहेगी।  परिणाम यह होगा कि इनके द्वारा निर्मित उत्पाद या दी गई सेवा राष्ट्रीय/ अंतराष्ट्रीय मानको पर खरी नही उतरेगी और प्रतिद्वंदिता में कही पीछे छूट जाएगी।  इसका असर अर्थव्यवस्था पर पडेगा और अर्थव्यवस्था दबाव में आ जाएगी। पुनश्च बड़े पैमाने पर छंटनी की प्रक्रिया में ये अकुशल लोग भारी मात्र में निकाले जाते है जो एक्सपीरियंस के आधार पर किसी न किसी  निजी शैक्षणिक संस्था में फिर पढ़ाने का कार्य करने लगते है वो भी कम वेतन पर। इस प्रक्रिया में अच्छे शिक्षको को नौकरी से हाथ धोना पड़ता है।  यह ठीक उसी तरह से है कि ब्लैक मनी वाइट मनी को चलन से बाहर कर देता है।

फिर वही विदक्षता का दुष्चक्र . 
यहाँ एक बात और गौर   करने लायक है कि इन संस्थाओं में कार्यरत शिक्षक एवं संस्था प्रमुख के बीच सामंत और दास जैसा रिश्ता होता है शिक्षक चाहे कितना भी प्रशिक्षित और योग्य हो संस्था प्रमुख हमेशा उसे हिकारत से देखता है  कई बार उसे उसकी हैसियत याद करवाता है। सारा का सारा खेल मुनाफे का है कुल मिलाकर चाटुकारिता भ्रष्टाचार के सहारे पूंजीपतियों ने शिक्षा व्यवस्था को अत्यंत दूषित एवं भ्रष्ट  कर दिया है जो पूरे देश में फैले भ्रष्टाचार और बिगड़ी अर्थव्यवस्था का मूल कारण है।

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

अपने आँचल में कूड़ा, विष्ठा और जहर को समेटे यमुना

दिल्ली जाते हुये कालिंदी कुंज पुल से जब आप बांयी ओर निगाह डालते हैं तो एक बारगी लगता है कि बजबजाते सीवर के ऊपर से गुजर रहे हो। पिघले तारकोल-सा काली यमुना और उस पर झक सफेद झाग  की मोटी चादर ऐसा लगता है कि  ढेर सारे मरणासन्न जानवर फेंचकुर छोड़ रहे हो। एक कारुणिक दृश्य दिखता है गंदे आर्सेनिक युक्त नाले  और सीवर यहाँ यमुना का नाम प्राप्त कर लेते है और यमुना सफ़ेद झाग के कफ़न में दफ़न हो जाती है।  छोटी और सहायक नदियों के और भी बुरे हाल हैं।  हिंडन नदी जिसके तट पर सैंधव सभ्यता पनपी वह भी कब की मृत घोषित है।  अपने आँचल में कूड़ा, विष्ठा, जहर को समेटे ये नदियां तथाकथित विकास के नीचे दबी अंतिम साँसे लेने को अभिशप्त हैं। 

गर्मी आने वाली है।  पूरे राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र (एन सी आर) में पानी के लिए हाहाकार मचने वाला है। फरीदाबाद से गाजियाबाद तक  भूगर्भ जल विषैला होता जा रहा।  यहाँ पीने का पानी बोतल में मिलता है। कंपनियों की पौ  बारह है।भूजल  का सीधा ताल्लुक पेड़ों  के सूखने से है। जैसे जैसे भूजल नीचे जायेगा या विषैला होगा वैसे ही पेड़ों की जड़े पानी प्राप्त करने में कठिनाई महसूस करेगीऔर पानी के अभाव में या जहर के प्रभाव से  पेड़ सूखने लगेगे।  वह इलाके जहा भूजल खतरनाक ढंग से निम्न स्तर पर पहुच  गया है वहा हरियाली का नामोनिशान ख़तम है। नदियों का जहरीला होना, पानी का कम होना, पारंपरिक तालाबो का ख़तम होना, भूजल के लिए शुभ नहीं। जमीन से इस कदर पानी का दोहन हो रहा कि थोड़े ही दिन में पेट्रोल और पानी के रेट बराबर हो जायेंगे। अभी पानी २५ रूपये लीटर और पेट्रोल ७० रूपये दूध ३० रुपये  है। आज से २५ साल पहले यह कोई  सोच भी नही सकता था। 

शहद के छत्ते गायब , गौरैया के साथ गिद्ध और कौवे भी गायब , खेत खलिहान गायब , घर के आँगन गायब , रिश्ते नाते गायब , गंगा जमुना गायब , मीठे पानी के झरने गायब , विकास ले के चाटोगे ? ये विकास किसके लिए ? कौन इससे लाभान्वित होगा ? अरे अभी ज़िंदा रहने का सवाल है।  कितनी विडम्बना है कि आदमी को मशीन और मशीन को आदमी बनाए जाने का उपक्रम चल रहा है और इसी को विकास कहा जा रहा।  
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हमें नही चाहिए 
बड़े बड़े कारखाने 
जिसमे से निकलता है 
जहरीला धुँआ
और फ़ैल जाता है 
हवाओं में फिर दिल में 
झौंस देता है 
कोमल कोंपलों को 
हमें नही  चाहिए
चाँद की जमीन और पानी  
धरती पर मीठे झरनों को 
मुक्त कर दो 
कोई भी तकनीक जिससे 
मानवता का दलन
और प्रकृति का गलन 
होता है तज दो
बिना किसी भाव के 
बिना किसी लालच के 
आने वाली पीढ़ियों की खातिर।