रविवार, 9 जनवरी 2011

धारा गंगा की

पटना की रहने वाली संवेदनशील   लेखिका आलोकिता ने  हरी धरती की पहरेदार की भूमिका निभाते हुए  जनचेतना के क्रम में गंगा की यात्रा और मलिनता पर ध्यान आक्रोष्ट करने का प्रयास किया है
 
मैं हूँ बहती निर्मल धारा गंगा की 
 यात्रा करती हिमालय से बंगाल कि खाड़ी तक की 
                    हुआ था हिमालय के गोमुख में 
                     पावन निर्मल जन्म मेरा 
                     बीता था हरिद्वार तक में 
                     चंचल विह्वल बचपन मेरा
फिर मैं आगे बढती हीं गयी 
कठिनाई बाधाओं को तोड़ती गयी  
                      पथरीले इलाके को छोड़कर 
                      आई मैं समतल जमीन पर 
                      फिर क्या था बरस पड़ा मुझपर 
                      मनुष्यों का भारी कहर 
उद्योगों के कचडे, मल, मूत्र इन सभी को 
मुझमे समाहित कर डाला 
मुझको तथा मेरी जवानी को 
इन्होने मलिन कर डाला 
                      मैं सहनशीलता की मूरत बन 
                      बस आगे बढती हीं गयी 
                      फिर दया की पात्र बन 
                      बंगाल कि खाड़ी में शरण ली 
मैं बन गयी बेबश मलीन धारा गंगा की
यात्रा पूरी हुई हिमालय से बंगाल कि खाड़ी तक की

10 टिप्‍पणियां:

  1. आलोकिता के एक एक शब्द गंगा की पोईदा क़ा बयान कर रहे है
    गंगा को पीड़ा से मुक्त कराये

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  2. पथरीले इलाके को छोड़कर
    आई मैं समतल जमीन पर
    फिर क्या था बरस पड़ा मुझपर
    मनुष्यों का भारी कहर
    उद्योगों के कचडे, मल, मूत्र इन सभी को
    मुझमे समाहित कर डाला
    मुझको तथा मेरी जवानी को
    इन्होने मलिन कर डाला
    मैं सहनशीलता की मूरत बन
    बस आगे बढती हीं गयी
    फिर दया की पात्र बन
    बंगाल कि खाड़ी में शरण ली
    मैं बन गयी बेबश मलीन धारा गंगा की
    यात्रा पूरी हुई हिमालय से बंगाल कि खाड़ी तक की
    bahut sundar
    sach ko likhaa aapne
    likhati jaaye

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  3. बहुत सुन्दर! बेहतरीन रचना!

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  4. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति. बधाई..

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  5. इस बेहतरीन सुन्दर रचना के लिये आलोकिता को बधाई।

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  6. सराहनीय एवं प्रोत्साहन की हकदार कविता.

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  7. Very nice poem, can I use it? (not sure where I will use it, but if any occasion/situation arrives it will be very good)

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  8. रविन्द्रनाथ जी आप इस कविता का प्रयोग वाणिज्यिक तरीके से नहीं कर सकते अगर यूँही कहीं इसका उपयोग किया भी तो रचयिता का नाम "आलोकिता" साथ में होना आवश्यक है |

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  9. Beti tumhari kavita bahut pasand aaya aage aese hi likhte rahna.

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