शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

बाघों के संरक्षण के लिए मातमपुरसी

पिछले 36 महीनो  में उत्तर प्रदेश के जिला खीरी एवं पीलीभीत के जंगलों से बाहर आये  बाघों के द्वारा खीरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी, लखनऊ, फैजाबाद में करीब दो दर्जन के लोग मारे जा  चुके हैं. इसे मानवता के लिए दुखद माना  जाना चाहिए. किन्तु उन बाघों के लिए क्या जिनका  शिकार  मनुष्य कर रहे हैं. बाघ जन्म से हिंस्रक और खूंखार तो होता है, लेकिन नरभक्षी  नहीं होता। बाघ को मानवजनित अथवा प्राकृतिक परिस्थितियां मानव पर हमला करने को विवश करती हैं
प्राकृतिक रूप से खूंखार होने  होने के बाद भी विशेषज्ञों की राय में बाघ किसी पर यूं ही आक्रमण नहीं करता
इसीलिये  वह  बस्ती  से दूर रहकर घने जंगलों में रहता है और तो और  दिन को छुप कर रहता है. । परिस्थियों से मजबूर  होने की वजह से तथा भूख से पीड़ित होने के कारण वह हमला करता है.  जिम कार्बेट का भी कहना था " बाघ बूढ़ा होकर लाचार हो गया हो, जख्मी होने से उसके दांत, पंजा, नाखून टूट गये हो या फिर प्राकृतिक या मानवजनित विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हों, तभी बाघ इंसानों पर हमला करता है।" उनका यह भी मानना था कि जन्म से खूंखार  होने के बावजूद  बाघ मानव पर एक अदृश्य डर के कारण हमला नहीं करता और यह भी कोई जरूरी नहीं है कि नरभक्षी बाघ के बच्चे भी नरभक्षी हो जायें
मेरा अपना विचार है बाघों को सुनियोजित तरीके से नरभक्षी बनाया जाता है फिर उनकी हत्या को वैध रूप प्रदान करने में आसानी हो जाती है. यह सब उस मानवता के नाम पर होता है जो चाँद कागज के टुकडो में बिकती है. बाघों का शिकार बढ़ती मांग का ही नतीजा है .  6 साल पहले बाघ की हड्डियां प्रति किलो 3,000 से 5,000 डॉलर हुआ करती थी। बाघ की हड्डियों का इस्तेमाल कामोत्तेजना बढ़ाने वाले उत्पाद, जोड़ों या हड्डियों की बीमारियों को दूर करने की दवाएं आदि बनाने में किया जाता है। वहीं बाघ के नाखून बुरी शक्तियों को दूर भगाने के लिए लोकप्रिय हैं। इनकी कीमत भी हड्डियों के बराबर ही है। तब से लेकर अब तक इनकी कीमतें 10 से 15 फीसदी बढ़ी हैं।
अरबो  रूपये खर्च होने के बाद  भी बाघों का संरक्षण   चुनौती बना हुआ है। कार्बेट टाइगर रिजर्व में वर्ष 2010 में 3 बाघों की मौत हुई। जबकि एक बाघ को आदमखोर घोषित कर मारने का अभियान चल रहा है।  2009 में इसी  रिजर्व में यह आंकड़ा 6 तक पहुंच गया था।  इसके अलावा वर्ष 2010 में कार्बेट टाइगर रिजर्व  ६ बाघों की प्राकृतिक कारणों की वजह से मारे जाने की बात बतायी गयी ( ढिकाला जोन में 5 जनवरी को आपसी लड़ाई व 11 जनवरी को प्राकृतिक कारण से नर बाघों मौत हुई। 2 जुलाई को कालागढ़ रेंज में पीठ में घाव होने से नर बाघ की मौत हो गई। रामनगर वन प्रभाग में एकमात्र बाघ की मौत 19 अगस्त को कालाढूंगी रेंज में नाले में बहकर होने से हुई। 14 मार्च को उत्तरी जसपुर रेंज में नर बाघ का शव मिला। वहीं 24 नवंबर को दक्षिणी जसपुर रेंज में बीमार हालत में मिले मादा बाघ ने पंतनगर में उपचार के दौरान दम तोड़ दिया।) यह मौतें बाघ संरक्षण के अभियान को तगड़ा झटका देने वाली रही। 
संरक्षण के नाम पर अघिक आर्थिक मदद स्वीकृत कराने के फेरे में विभाग बाघों की संख्या गलत बताता आ रहा है। इनके जानकार कम होने से वे सभी को गुमराह कर देते हैं।
ऐसे में बाघों के संरक्षण के लिए सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर चलाई जाने वाली परियोजनाए या गैर सरकारी संगठनो की मातमपुर्सी मज़ाक नहीं तो और क्या है.

3 टिप्‍पणियां:

  1. ज्ञानवर्धक पोस्ट और एक अच्छा मुद्दा

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  2. आपका लेख गहन शोध का निष्कृष है । बाघों की घटती संख्या हमारे लिये चिंता का विषय है । पर्यापरण की कडी में बाघों का एक अहम स्थान है । और कही ना कही इनका कम होना हमारे जीवन पर भी नकारत्मक प्रभाव डाल रहा है ।

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  3. bahut gahan adhyayan kiya hai aapne lekh dekh kar hi pata chal raha hai kafi jankariyan mili ise padh kar jo sayad jaan na pati

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