शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

वास्तविक हरित क्रांति का पहला चरण: बैल चालित पम्प


भारत में तकनीकी विकास इतना हो गया हम चाँद और मंगल पर बेस बनाने  की तैयारी में लगे है. किन्तु आज भी लगभग ३० परसेंट जनता दो वक्त की रोटी का इंतजाम बमुश्किल कर पाती है तो ऐसे  में तकनीकी विकास की सार्थकता पर बड़ा  प्रश्नचिन्ह लगता है.

तकनीकी विकास मतलब उपग्रह छोड़ना संकर प्रजाति के बीज बनाना सूचना आदान प्रदान की सहूलियतो  को तीव्र करने  इत्यादि से लगाया जाता है.जबकि विकास पैमाना यह होना चाहिए कि शोषण से कितनी मुक्ति मिली और प्रक्रति से कितना तादात्म्य स्थापित हुआ. 

उपर्युक्त सिद्धांत को अमलीजामा पहनाते हुए कानपुर के वैज्ञानिको और किसानो के मिलेजुले प्रयासों से एक बैल चालित पम्प का विकास किया गया है. बैलो के प्रयोग से एक तरफ जहा डीजल की बहुमूल्य  बचत करके कृषि कार्य को आत्म निर्भता की ओर ले जाया जा सकता है वही ट्रैक्ट्रर के इस्तेमाल करने वाली भारी भरकम लागत से भी निजात पाया जा सकता है. 

इस पम्प की विस्तृत जानकारी इस विडियो के माध्यम से दी गयी है


इस यंत्र की कीमत बोरिंग समेत लगभग 58 हजार रूपये है. सरकार से इस पर सब्सिडी देने क अनुरोध किया गया है किंतु अभी तक कोइ संतोषजनक जवाब नही मिला है. 
इस प्रकार यह स्वदेशी तकनीक है जिसके सहारे हम वास्तव मे हरित क्रांति की ओर सतत रूप से बढ  सकते है.



नोट: इस यंत्र का प्रयोग  कानपुर मे करौली और परियर नामक स्थान पर सफलतापूर्वक किसानो द्वारा किया जा रहा है. यदि किसी को यह अप्प्लीकेशन देखना हो तो वह यहा आकर देख सकता है.

4 टिप्‍पणियां:

  1. इस नई खोज के लिए मुबारकवाद। सरकार को इस रकम मे कमीशन की गुंजायीश न दीखने के कारण जवाब नहीं दिया है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. विकास पैमाना यह होना चाहिए कि शोषण से कितनी मुक्ति मिली और प्रक्रति से कितना तादात्म्य स्थापित हुआ
    True sir, And sorry to say at this front, we are going backwards.

    उत्तर देंहटाएं